नई दिल्ली : कहा जाता है कि भारत एक ऐसा देश है जहां आज भी मानवता जिंदा है। यहां आज भी लोग एक-दूसरे लोगों के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करते, और निस्वार्थ भाव से अपनी जान की बाजी लगा देते है। ठीक ऐसा ही मामला देश में जारी कोरोना संकट के दौरान देखने को मिला। जहां कई लोगों ने अपनी परवाह किये बगैर अपने बेड को किसी और को दे दी, जिससे उसकी जान बच सकें।
एक ऐसा ही राजस्थान से सामने आया है। जहां 60 वर्षीय एक बूढ़ी अम्मा ने 40 वर्षीय शख्स के लिए अपने बेड को छोड़ दिया। क्योंकि उसकी हालत बेहद खराब थीं और उसके छोटे-छोटे बच्चे थे। बूढ़ी अम्मा ने डॉक्टर से कहा कि उन्होंने अपने बच्चों की शादी कर ली है। जिससे उनके कंधों पर अब कुछ खास जिम्मा नहीं है। लेकिन बाबूराम (40 वर्षीय शख्स) को अभी अपने बच्चों की परवरिश करनी है। इसलिए आप इन्हें मेरा बेड दें दे। मैं व्हीलचेयर पर बैठकर बेड का इंतजार कर लूंगी।

आपको बता दें कि इन अम्मा का नाम लेहर कंवर है, जो कोरोना संक्रमण के लक्षणों से जूझ रही हैं। शुक्रवार सुबह सांस लेने में तकलीफ होने पर उन्हें पाली के बांगड अस्पताल लाया गया था। 4 घंटे ओपीडी में व्हीलचेयर पर इंतजार करने के बाद लेहर को एक बेड मिला लेकिन तभी उनकी नज़र गाड़ी में बेसुध पड़े एक युवक पर चली गई। गाड़ी में 40 वर्षीय बाबुराम मौत और जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा था।
लेहर कंवर ने जब तड़पते बाबूराम को देखा तो उसकी पत्नी को बुलाकर पूरी स्थिति के बारे में जानकारी ली। इसके बाद लेहर ने डॉक्टर को बुलाया और अपना बेड बाबूराम को दे देने की प्रार्थना की। आपको बता दें कि जिस वक़्त लेहर ने ये फैसला किया उस दौरान बाबूराम का ऑक्सीजन लेवल 43 पर पहुंच गया था और उन्हें वक़्त से इलाज नहीं मिलता तो उनकी जिंदगी बचाना काफी मुश्किल हो जाता।
बता दें कि इससे पहले नागपुर में भी 85 वर्षीय नारायण भाऊराव दाभाडकर ने इसी तरह एक युवक के लिए अपना अस्पताल का बेड दे दिया था। नारायण भाऊराव दाभाडकर भी नागपुर के एक अस्पताल में भर्ती थे, उन्होंने एक दिन देखा कि एक महिला अपने पति को एडमिट करने के लिए गुहार लगा रही है। अस्पताल में बेड न होने के चलते उन्हें मना कर दिया गया था लेकिन वह डॉक्टरों से लगातार प्रार्थना कर रही थी।

इतना देखकर नारायण भाऊराव दाभाडकर ने डॉक्टर को बुलाया और अपना बेड इस महिला के पति को दे देने की गुजारिश की। नारायण भाऊराव दाभाडकर ने भी कहा था- मैं अपनी पूरी जिंदगी जी चुका हूं, ये जवान हैं और इनके छोटे-छोटे बच्चे हैं। कृपा करके मेरा बेड इन्हें दे दिया जाए, मैं घर जाना चाहता हूं। अस्पताल ने उनकी बात मानकर नारायण भाऊराव दाभाडकर का बेड उस युवक को दे दिया था लेकिन घर जाने के तीन दिन के अंदर ही नारायण भाऊराव दाभाडकर की मृत्यु हो गई थी। आपको बता दें कि नारायण भाऊराव दाभाडकर एक स्वयं सेवक संघ के सदस्य भी थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम क्षणों में भी आरएसएस के दायित्वों का निर्वाहन किया।