महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के विस्तार को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लाए गए प्रस्तावित संविधान संशोधन बिलों पर संसद में तीखी बहस देखने को मिली। मसौदा बिल में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी शामिल है, जो 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर आधारित है।
हालांकि, इस कानून के लागू होने को भविष्य की जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है, जो विवाद का मुख्य कारण बना हुआ है। सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन आवश्यक है, जबकि विपक्ष की मांग है कि मौजूदा 543 सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत लागू किया जाए।
जनगणना प्रक्रिया देश की जनसंख्या, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का व्यापक डेटा जुटाने का माध्यम है। भारत में यह प्रक्रिया हर 10 साल में होती है और इसे जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत संचालित किया जाता है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जबकि 2021 की जनगणना कोविड-19 के कारण टल गई थी। अब नई जनगणना के बाद ही परिसीमन प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।
परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाओं का पुनर्निर्धारण, जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इतिहास में 1976 के परिसीमन के दौरान उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या वृद्धि को लेकर बड़ा विवाद सामने आया था। यही आशंका अब भी बनी हुई है, खासकर दक्षिणी राज्यों में, जहां जनसंख्या वृद्धि दर अपेक्षाकृत कम है।
संसद में इस मुद्दे पर दो दिन की बहस के बाद मतदान हुआ, जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संशोधन बिलों के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। हालांकि, प्रस्तावित संविधान (131वां संशोधन) बिल को पारित नहीं किया जा सका।
सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण कानून 2023 लागू हो चुका है, लेकिन सीटों का आरक्षण परिसीमन के बाद ही लागू होगा। वहीं विपक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों में देरी मानते हुए तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है। इस मुद्दे ने आने वाले समय में देश की राजनीति और चुनावी रणनीति को और गर्माने के संकेत दे दिए हैं।