नई दिल्ली : देश में जारी कोरोना संकट के बीच अकसर अस्पतालों में बेड नहीं होने और संसाधनों की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। जिसकी वजह से मरीजों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, यही नहीं कई मरीज ऐसे भी थे जिन्हें समय पर जरूरी इलाज नहीं मिलने से उनकी जान चली गई। ऐसा ही चौंकाने वाला मामला बिहार के बेतिया से सामने आया है, जहां एक एंबुलेंस चालक को बेतिया के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (जीएमसीएच) में सही वक्त पर बेड और मेडिकल सुविधा नहीं मिल सकी, जिसके उसकी मौत हो गई।
बताया जा रहा कि पश्चिमी चंपारण में एंबुलेंस ड्राइवर भरत महतो (50) कोरोना महामारी के दौरान लगातार मरीजों की सेवा में जुटे रहे। इसी बीच पता नहीं वो कब खुद ही कोविड संक्रमित हो गए। तबीयत बिगड़ने के बाद परिजन उन्हें रविवार को बेतिया के जीएमसीएच अस्पताल लेकर आए। हालांकि, यहां एंबुलेंस चालक को जब तक बेड और इलाज मिलता उससे पहले ही उनकी मौत हो गई।
वहीं इस मामले पर एंबुलेंस चालक के बेटे ने अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उसने आरोप लगते हुए कहा कि हमने अपने पिता को बेड दिलाने के लिए अस्पताल में काफी दौड़-भाग की। लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि कोई भी बेड उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उन्होंने हमारे बाद पहुंचे दो मरीजों को बेड उपलब्ध करा दिया।
खबरों की मानें तो भरत महतो 1 मई तक बेतिया कलेक्ट्रेट स्थित कोविड नियंत्रण कक्ष में इमरजेंसी एम्बुलेंस ड्राइवर के तौर पर तैनात थे। हालांकि, बीमार होने के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई और वो मझौलिया प्रखंड के अपने पैतृक गांव चले गए और क्वारंटीन में रहने लगे। भरत महतो के भाई ने बताया कि उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद हम उन्हें सुगौली में इलाज के लिए ले गए लेकिन आराम नहीं हुआ। फिर दो दिन बाद उन्हें मझौलिया के सरकारी अस्पताल (PHC) में ले आए। वहां उनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद वहां से भरत महतो को जीएमसीएच रेफर कर दिया गया। हम तुरंत ही उन्हें लेकर जीएमसीएच आए।
परिजनों के मुताबिक, अस्पताल में करीब चार घंटे तक हम लगातार मरीज को बेड दिलाने के लिए इधर-उधर भागते रहे, लेकिन बेड नहीं मिला। वहीं मृतक एंबुलेंस ड्राइवर के बेटे के लगाए गए आरोपों को जीएमसीएच के अधीक्षक प्रमोद के. तिवारी ने खारिज किया है। उन्होंने कहा कि जब मरीज को यहां लाया गया था तो उसकी हालत गंभीर थी। बेड किसी और को मिला हो ये नहीं होना चाहिए और नहीं हो सकता। उन्होंने ये भी माना कि यहां ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर बेड दिया जाता है। ऐसे में एंबुलेंस ड्राइवर की जगह पर किसी और को बेड देने का सवाल नहीं उठता।
भला मामला जो भी हो लेकिन जिस तरह इन सभी मामलों पर अस्पताल और अस्पताल प्रशासन प्रशासन का रवैया सामने आ रहा है, वो काफी शर्मनाक है।