{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
कहते है कि कुछ बड़ा करने के लिए सोच भी बड़ी होनी चाहिए, सत्यमेव जयते को आधार मानकर जो अपने जीवन के कर्म को चुनता है उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते है, ऐसा व्यक्ति ही लाखों लोगों के भविष्य को बढ़ा सकता है और उन्हें एक नए जीवन का आधार से सकता है।
राजस्थान राज्य के पिलानी में जन्मे जीडी बिड़ला जी एक ऐसे ही विरले उदाहरण है जिन्होनें अपनी सोच और समझ से विश्व स्तर पर भारत को सम्मान दिलाया। कई बार हम मज़ाक मज़ाक में किसी पर तंज कसते हुए कहते है ना कि भाई बड़ा टाटा बिड़ला बन रहा है क्या ? जी हां, ये वही बिड़ला है जिन्होंने बिड़ला ग्रुप की स्थापना की और आज 200 अरब से भी अधिक की इनकी परिसंपत्ति है।
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सामजिक व्यवस्था में बिड़ला मारवाड़ी बनिए होते है जिनके बारे में कहा जाता है कि व्यापार इनकी बुद्धि में होता है। और आज उसी मारवाड़ी सभ्यता से निकले कई लोगों का हिंदुस्तान के व्यापार पर एकाधिकार है। मारवाड़ वैसे जोधपुर संभाग को कहा गया लेकिन मारवाड़ी शेखावाटी इलाके से आते है। मारवाड़ियों के सफल होने के पीछे यह भी तर्क दिया जाता है कि संसाधनों को सहेज कर रखने की समझ इनकी जबरदस्त होती है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह स्थानांतरित होती है।

जीडी बिड़ला का जन्म पिलानी में हुआ था और उनके जन्म के समय उनके परिवार का व्यवसाय था ब्याज पर पैसे देना, ये लोग ब्याज पर पैंसे देते थे जिनमें कई राजा भी शामिल थे। अंग्रज़ों के आने के बाद इन्होने अपना कारोबार राज्य के बाहर ले जाने के बारे में विचार किया और पिलानी से कोलकाता चले आये और इतिहासकर कहते है कि वो नाथूराम सराफ के बनाये हुए हॉस्टल में रहने लगे. यहां उनकी व्यापारिक समझ विकसित हुई और मात्र 16 साल की उम्र में तो उन्होनें ट्रेडिंग फॉर्म खोल ली और जूट का काम शुरू किया।
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इस काम में उन्हें खूब मुनाफा हुआ और इसके बाद उन्हें अंग्रज़ों की राजनीति का भी शिकार होना पड़ा लेकिन उन्होनें हार नहीं मानी। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ व्यापारियों ने तो उनका कारोबार तक बंद करवाने की कोशिश की। लेकिन जीडी बिड़ला जी कहा रुकने वाले थे, उनकी सोच बहुत बड़ी थी और उन्होंने साल 1917 आते आते तो उन्होंने अपनी खुद की फैक्ट्री डाल दी। इस जूट के कारखाने का नाम उन्होंने ” बिड़ला ब्रदर्स ” रखा और साल 1939 में उनकी यह फैक्ट्री देश की 13 वी सबसे बड़ी फैक्ट्री बन गयी।
एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि साल 1970 आते आते जीडी बिड़ला की संपत्ति सिर्फ 4 करोड़ से 500 करोड़ हो गयी, यानी की करीब 94 गुना अधिक, आप कल्पना कीजिये की साल 1945 तक उनके पास सिर्फ 20 कंपनियां थी लेकिन साल 1970 तक उनके पास 150 कंपनियां हो गयी थी, इतिहासकार तो इतना तक कहते है कि उनसे डरकर ही सरकार ने लाइसेंस राज और एमआरटीपी जैसे एक्ट लगाये।
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जीडी बिड़ला जी को जानने वाले कहते है कि उनकी नेहरू से नहीं बनती थी लेकिन सरदार पटेल के वो बेहद करीब थे और आज़ादी की लड़ाई में जितना धन उन्होंने दिया शायद ही किसी कारोबारी ने दिया होगा। साल 1915 में ही वो गाँधी जी के साथ जुड़ गए थे और उनके विचारों के वो कट्टर समर्थक थे।
जीडी बिड़ला की जीवनी ने उनके और शास्त्री जी के दिलचस्प किस्से का वर्णन भी किया गया है, दरअसल शास्त्री जी जीडी बिड़ला को बहुत मानते थे और ऐसे ही एक बार उन्होंने उनसे औद्योगिक क्रांति लाने का अनुरोध किया जिसे उन्होंने हंस कर टाल दिया क्योंकि वो चाहते थे की आर्थिक सुधार की प्रक्रिया सरकार के द्वारा हो। सिर्फ इतना ही नहीं बिड़ला दुर्गापुर में स्टील प्लांट लगाना चाहते थे और बहुत पैसा भी खर्च कर दिया था लेकिन नेहरू जी ने ऐसा होने नहीं दिया और वह सरकार ने अपने हाथों में ले लिया।
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इतिहासकार कहते है कि उन्होंने इस बात के लिए नेहरू जी को कभी माफ़ नहीं किया, ‘गांधीजी और विंस्टन चर्चिल.’ को आदर्श मानने वाले जीडी बिड़ला मानते थे की देश के हर व्यक्ति को ईमानदारी से अपना काम करना चाहिए और कभी भी अपनी कमजोरियों को अपने सपनों के आड़े नहीं आने देना चाहिए।