{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
हमारे शास्त्रों और धर्म ग्रंथों में स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना की गयी है। कहते है कि जो धर्म सम्मत कर्म करता है उसे स्वर्ग और जो अधर्मी होता है उसे नर्क प्राप्त होता है। धर्म क्या है और अधर्म क्या है यह भी धर्म ग्रंथों में बताया और समझाया गया है।
लेकिन स्वर्ग और नर्क, ये तो मृत्यु के बाद की बाते है। जीवन प्रत्यक्ष होता है। हम उसे जीते है, महसूस करते है। भवनाओं को कहते है, इसलिए कहा जाता है की स्वर्ग यही है क्यूंकि मरने के बाद किसी ने क्या देखा वो बताने के लिए उसका शरीर जीवित नहीं रहता।

ये जो जीवन है वो स्वर्ग जाने की सीढ़ी ही तो है, पहली सीढ़ी है बच्चे का जन्म लेना, उस दौरान बच्चा गर्भावस्था के प्रवेश द्वार से अनेक कष्टों को सहन कर दुनिया में आता है। और वही से प्रकृति द्वारा रचित नौ ग्रहों का कार्य शुरू होता है।
जन्म लेते ही उसके अच्छे बुरे कार्यों के लेखे जोखे के आधार पर उसके जीवन का भाग्य निर्माण होता है। और उसी के हिसाब से जीवन में सुख दुःख प्राप्त होते है। जिस लग्न में उसका जन्म हुआ उसी के योग के अनुसार उसे जीवन में हानि लाभ, यश अपयश प्राप्त होता है।