{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
वर्तमान में आज इसे फैशन कहे या जानकारी का अभाव, आज कल वास्तविकता को नकारा जा रहा है जिसके सर्वप्रथम दोषी वह नव युवतियां है तो अज्ञानतावश वह पुरुष है जिसने हानि लाभ का ज्ञान नहीं होने के कारण उन्हें उचित ज्ञान से अवगत नहीं करवाया। वैसे शिशु के लालन पालन के समय माँ को देखकर ही बच्चे उन सभी कार्यों का अनुसरण करते है किन्तु आज कितनी बड़ी क्षति आज जान बुझ के की जा रही है।
क्या कभी किसी डॉक्टर के परामर्श से ऐसे किया गया या माँ के अस्वस्थ होने के कारण ऐसा नहीं हो रहा है लेकिन माँ का दूध जरुरी है ताकि बच्चे को आने वाली बीमारियों से बचाया जा सके। लेकिन आज हम देख रहे है कि, अधिकांश माताएं अपने बच्चों को ऊपरी दूध दे रही है अपना नहीं ! उससे बच्चे के शारीरिक पोषण पर असर पड़ता है क्योंकि माँ के दूध में सभी प्रकार के पोषक तत्व होते है और यह बच्चे के लिए बेहद ज़रूरी है।

दरअसल माँ का विवेक, उसकी आकृति, गुण, सहनशीलता, माँ की रक्षा शक्ति सब उसके दूध में ही समाहित है। लेकिन आज कल अधिकांश शिक्षित माताएं अपने शरीर को सही रखने के कारण बच्चे को दूध नहीं देती है और स्तनपान करवाने में परहेज करती है। इसलिए उन्हें इस बात का चिंतन करना चाहिए की क्या वो सही कर रही है ?
मनुष्य विवेकशील है और ज्ञान का भंडार है लेकिन क्या आपने सोचा है कि संसार के पशु पक्षी और जानवरों ने क्यों अपने बच्चों को स्तनपान करवाना नहीं छोड़ा ? और हमे ज्ञान है उसके बाद में भी हममें इतनी अज्ञानता आ गयी है कि हमने यह छोड़ दिया ! हमें इस पर विचार करना होगा। क्यूंकि मां की शक्ति संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली होती है और संकट में मनुष्य बस मां को ही याद करता है।