{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
यह तो सत्य है बल्कि इसके बिना तो मानव जीवन के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। पृथ्वी का लगभग दो तिहाई भाग जलमग्न है कुदरत ने बारिश , नदियां , तालाब , कुएं और सागर आदि स्रोतों को जल प्रदान किया ताकि पृथ्वी पर जल की मात्रा बनी रहे।
जल की कीमत को केवल वही पहचानता है जिसकी माँ ना जाने कितने किलोमीटर चलकर पानी भरकर लाती है, तब जाकर उसे पीने का पानी मिलता है। कुदरत ने पंचतत्वों में भी जल को शामिल किया है। ये पांच तत्व जब चाहे प्रलय ला सकते है। आज अनेक देश जल के संकट का सामना कर रहे है और उसे शुद्ध करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।
आप चाहे कितना ही विकास कर ले लेकिन जल के बिना तो कुछ भी नहीं है। आज 50 फीसदी से भी अधिक देश में जल की कमी हो गयी है। अगर सिर्फ शहरी नागरिक जल बचाने का संकल्प ले ले तो जल की समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। खेती के लिए भी जल चाहिए तो हम सबको सोचकर और समझकर जल को खर्च करना होगा।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा की आने वाली पीढ़ी को जल का संकट नहीं देखना पड़े, नदियों और तालाबों का पानी सुख रहा है और इनके किनारों का जल स्तर भी घटता जा रहा है और इसका सबसे बड़ा कारण है जल का अधिकतम दोहन करना। कोशिश यह करनी चाहिए की देहात और गांव में ज़मीनों पर तालाब खुदवा दिए जाए ताकि वर्षा का जल सुरक्षित रहे।
सरकार को चाहिए की वो नहर खुदवाये वही तालाबों के किनारे पेड़ लगवा दिए जाए। खाली जगह में भी कुछ बो दिया जाए और जल संचय की आदत लोगों में विकसित की जाए तो उसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो कुँए सूख गए है वो पानी से भर जायेगे वही इसमें पूरी जनता के सहयोग की भी जरूरत है। बिना जागरूकता के जीवन में कोई भी कार्य नहीं किया जा सकता है और जल संचय के लिए भी यही नीति अपनानी होगी।
आप चाहे अमेरिका को देख लीजिये या इज़राइल को वो सभी देश पानी पर आत्मनिर्भर है और उसका कारण है कि उन्होनें पानी की बचत को जन अभियान बना दिया और हमे भी अब कुछ ऐसा ही करने की जरूरत है।