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दुग्ध उत्पादकों की कार्यशाला में खाली रहीं कुर्सियां, पशुपालकों ने बताई बढ़ती लागत की परेशानी

बड़वानी में आयोजित दुग्ध उत्पादक एवं पशुपालक जागरूकता कार्यशाला में किसानों की कम भागीदारी रही। पशुपालकों ने महंगे पशु आहार, कम मुनाफे और बढ़ते कर्ज की समस्या उठाई।

By: BS Yadav 
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दुग्ध उत्पादकों की कार्यशाला में खाली रहीं कुर्सियां, पशुपालकों ने बताई बढ़ती लागत की परेशानी

बड़वानी: जिला मुख्यालय पर दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों के लिए आयोजित जिला स्तरीय जागरूकता कार्यशाला में किसानों की अपेक्षाकृत कम भागीदारी देखने को मिली। कार्यशाला में पशुपालन विभाग और डेयरी विभाग के अधिकारी तो मौजूद रहे, लेकिन बड़ी संख्या में कुर्सियां खाली नजर आईं। इस दौरान पहुंचे पशुपालकों ने विभागीय बैठकों को औपचारिकता बताते हुए अपनी आर्थिक परेशानियां सामने रखीं।

कार्यशाला का उद्देश्य पशुपालकों को आधुनिक डेयरी तकनीकों, पशु प्रबंधन और आय बढ़ाने के उपायों की जानकारी देना था, लेकिन कई पशुपालकों का कहना था कि उनकी मूल समस्याओं पर कोई ठोस चर्चा नहीं हुई।

आधुनिक डेयरी तकनीकों की दी गई जानकारी

कार्यशाला में अधिकारियों ने उन्नत नस्ल सुधार, संतुलित पशु आहार, हरे चारे (साइलेज) के उत्पादन तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म गौरस एप और गौरस ई-मार्ट के उपयोग की जानकारी दी।पशुपालकों को कम लागत में गुणवत्तापूर्ण साइलेज तैयार करने की वैज्ञानिक पद्धति समझाई गई। साथ ही घर बैठे पशु आहार और अन्य सेवाओं की उपलब्धता के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग पर भी जोर दिया गया।इसके अलावा दुधारू पशुओं के नियमित टीकाकरण और कृमिनाशक उपचार को लेकर भी जागरूक किया गया।

“बैठकों से नहीं बदल रही स्थिति”

ग्राम लोनसरा निवासी पशुपालक नवीन जोशी ने बताया कि वे पिछले पांच वर्षों से दुग्ध उत्पादन का कार्य कर रहे हैं, लेकिन बढ़ती लागत और कम मुनाफे के कारण पशुपालक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।उन्होंने कहा कि पशु आहार, खली और चारे की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है, जबकि दूध का मूल्य लागत के अनुरूप नहीं बढ़ रहा। ऐसे में पशुपालकों की बचत नगण्य रह गई है।उनका कहना है कि कई पशुपालकों ने बैंक से ऋण लेकर डेयरी व्यवसाय शुरू किया था, लेकिन अब ऋण की किश्तें चुकाना भी मुश्किल हो रहा है। कई लोग अतिरिक्त आय के लिए मजदूरी करने को मजबूर हैं।

महंगे पशु आहार से बढ़ी परेशानी

ग्राम रेहगुण निवासी पशुपालक लालू बर्फा ने बताया कि उन्हें बैठक की जानकारी ग्राम सचिव के माध्यम से मिली थी। उन्होंने कहा कि कार्यशाला में अधिकतर विभागीय अधिकारी मौजूद थे, जबकि पशुपालकों की संख्या काफी कम रही।उन्होंने बताया कि वर्तमान में पशु आहार की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। सांची ब्रांड का पशु आहार लगभग 1200 रुपये प्रति बोरी, कपासिया खली लगभग 2700 रुपये तथा सूखा चारा करीब 1200 रुपये प्रति क्विंटल की दर से उपलब्ध है।ऐसी स्थिति में कई पशुपालक महंगा आहार खरीदने में असमर्थ हैं और कम गुणवत्ता वाले विकल्पों का सहारा लेने को मजबूर हैं।

“पशुपालकों की समस्याओं पर भी हो चर्चा”

पशुपालकों का कहना है कि विभागीय बैठकों में तकनीकी जानकारी तो दी जाती है, लेकिन दूध के उचित मूल्य, लागत नियंत्रण और आर्थिक सहायता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ठोस समाधान नहीं निकलता।उन्होंने मांग की कि सरकार और विभाग को डेयरी व्यवसाय की वास्तविक चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि पशुपालकों को आर्थिक राहत मिल सके।

विभाग ने बताया कार्यशाला का उद्देश्य

पशुपालन विभाग के उप संचालक डॉ. दिनेश पटेल ने बताया कि कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य पशुपालकों की आय बढ़ाना और उन्हें आधुनिक डेयरी तकनीकों से जोड़ना है।उन्होंने कहा कि कार्यशाला में किसानों की संख्या अपेक्षा से कुछ कम रही, लेकिन उपस्थित प्रतिभागियों को गौरस एप और वैज्ञानिक पशुपालन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।डॉ. पटेल के अनुसार पशु आहार की कीमतें बाजार आधारित होती हैं, लेकिन गौरस एप के माध्यम से पशुपालकों को संतुलित आहार और प्रबंधन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।

पशुपालकों की बढ़ती चिंता

कार्यशाला के दौरान सामने आई प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि जिले के पशुपालक बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि जागरूकता कार्यक्रमों के साथ-साथ डेयरी क्षेत्र की आर्थिक चुनौतियों के समाधान के लिए भी ठोस नीति और सहायता की आवश्यकता है।

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