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तब्लीगी जमात कब शुरू हुई ? आंतकियों से भी मिले है कनेक्शन

By: RNI Hindi Desk 
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तब्लीगी जमात कब शुरू हुई ? आंतकियों से भी मिले है कनेक्शन

दिल्ली का निज़ामुद्दीन इलाका, सूफी औलिया और फकीरों के लिए मशहूर, इस इलाके के दस्तावेज बहुत पुराने है। दिल्ली ने खून की होली का जो रंग देखा उसका गवाह यह इलाका रहा है। इस्लाम का प्रचार करने वाले लोग इस जगह को पाक मानते है।

कहा जाता है की इस जगह पर आकर सुकून मिलता है, मुस्लिम धर्म के लोग यहां अल्लाह का वजूद ढ़ूढ़ने आते है लेकिन अचानक से ये इलाका क्यों लोगो की नज़रों में आ गया ? इसका एक कारण है।

दरअसल तेलंगाना में कोरोना वायरस के कारण 6 लोगों की जब मौत हुई तो पता चला की ये तो दिल्ली एक धार्मिक सम्मलेन जिसे { तब्लीगी जमात } कहा जाता है, होकर आये थे।  

तेलंगाना से आई एक खबर ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। बाद में पता चला की 13 मार्च से 21 मार्च के बीच लगभग 1800 लोग इस जलसे में शामिल हुए जिसमे सैकड़ो विदेशी और कोरोना संक्रमित थे।

दरअसल 16 मार्च को जब सीएम केजरीवाल ने 31 मार्च तक सभी मॉल्स, सिनेमाहॉल आदि भी बंद कर दिए तो पता चला की 800 से अधिक विदेशी उस इलाके में जुटे हुए थे।

बाद में 600 से अधिक लोग पॉजिटिव निकले वहीं देश के 18 राज्यों के 5000 से अधिक लोगों पर ये संकट मंडरा रहा है तो आखिर ये जमात है क्या ? ये लोगो ऐसे क्यों एकत्र हुए ? इसका मकसद क्या है ? समझते है।

दरअसल उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले में कांधला पड़ता है, अंग्रेज़ो के आने से पहले मुगलों का दौर था और उन्होंने तलवार की नोंक पर लाखों हिन्दुओं को मुस्लिम बना दिया। जब अंग्रज़ों का दौर आया तो आर्य समाज के लोगों ने मुस्लिमों को हिन्दू बनाना शुरू कर दिया।

एक बड़ी आबादी जहां ईसाई बन रही थी वही लोग इस्लाम छोड़ हिन्दू बन रहे थे। बस फिर क्या था, इसी को रोकने के लिए साल 1926-27 में मौलाना इलियास ने यह जमात बनाई। जमात का उर्दू में मतलब होता है कुछ लोगों का एकत्र हो जाना।

इसका मकसद क्या था ? इसका मकसद था मुस्लिमों को अंग्रज़ों के दौर में भी अपनी कुरान और उसकी आयतों पर अमल करवाना ताकि लोग चमक धमक में आकर ईसाई ना बन जाए और पहली जमात लगी हरियाणा के मेवात में।

तब्लीगी का मतलब होता है किसी ख़ास कार्य या मकसद को समर्पित। जैसे हिंदुओं में संन्यासी होते है वैसे ही इस्लाम में तब्लीगी जमात होती है। ये बस जीवन भर अल्लाह और कुरान का प्रचार करते है। इनका किसी से कोई संबंध नहीं होता और ना ही इन्हे अपने जीने मरने का कोई डर होता है। ये सिर्फ अल्लाह की बंदिगी करते है और लोगों को इस्लाम की और आकर्षित करते है।

 40 दिन और चार महीने तक की जमातें निकाली जाती हैं और हर जमात में आठ से दस लोग होते है वहीं बाकी लोग इनकी सेवा करने के लिए होते है, जब जमात लगती है तो लाखों की संख्या में लोग इनको सुनने आते है। तो हम मेवात पर थे, जी ! पहली जमात लगी हरियाणा के मेवात में जिसका रेस्पॉन्स अच्छा आया। काफी लोग मुस्लिम बन गए थे।

आगे जाकर वर्चस्व बढ़ा और 6 उसूल बनाये गए,  कलिमा, सलात, इल्म, इक्राम-ए-मुस्लिम, इख्लास-ए-निय्यत, दावत-ओ-तब्लीग। 1941 में 25 हजार लोगों के साथ पहली मीटिंग हुई और  1949 में आज़ादी के ठीक बाद भोपाल में बहुत बड़ा  इज़्तेमा आयोजित हुआ था।

बाद में मुसलमानों में हनफी संप्रदाय के मानने वाले लोगों ने इसकी कमान हाथ में ली लेकिन सऊदी और ईरान में ये पैर नहीं जमा सका। सऊदी सुन्नी बाहुल्य वही शिया बाहुल्य ईरान, दोनों ने ही इसे मान्यता नहीं दी। कारण था 80 के दशक में सोवियत संघ की मदद से राज़ कर रहे नजीबुल्लाह को अफगानिस्तान से हटाने में आईएसआई की मदद करना। बाद में सब जानते है की कैसे तालिबान बना और अफगानिस्तान नर्क बन गया।

तब्लीगी जमात का नाता इतिहास की कुछ काली तारीखों से भी है, दरअसल इस जमात के दुनिया भर में 15 करोड़ सदस्य हैं, साल 1995 में इस जमात में दरार पड़ी और माना जाता है की कुछ लोगों ने आतंकी संघटनों से हाथ मिला लिया, ये मुख्यत: बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान में रुके। जब अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर हमला हुआ तो विकिलीक्स दस्तावेजों के मुताबिक ख़ुफ़िया रिपोर्ट में लिखा गया की कुछ लोग निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात परिसर में रुके थे। यह रिपोर्ट न्यूयॉर्क टाइम्स में 14 जुलाई, 2003 को प्रकाशित हुई थी।

निजामुद्दीन को मरकज कहा जाता है,  निजामुद्दीन में बंगले वाली मस्जिद इस जमात का मरकज है। इंग्लिश में इसे सेण्टर और हिंदी में इसे केंद्र कह सकते है। यानी मुल्क के तमाम जमाती जो अब अल्लाह के नुमांइदे है वो एक बड़ी जगह में जमा होते है। ठीक उसी प्रकार जैसे देवी के मंदिर तो कई है लेकिन तांत्रिक किया सिद्ध पीठों में हो होती है। वैसे ही निजामुद्दीन की बंगले वाली मस्जिद को सदियों से इस्लाम के फैलाव का केंद्र माना गया है।

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