अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का दो दिवसीय भारत दौरा कई मायनों में यादगार रहेगा, ट्रंप की भारत यात्रा को जिस तरह से इंटरनेशनल मीडिया कवरेज मिली वो अभूतपूर्व थी, शायद ही किसी अमेरिकी प्रेजिडेंट का इतना भव्य स्वागत हुआ हो। अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में 1 लाख लोगों की मौजूदगी में मोदी और ट्रंप का संबोधन हुआ जो की अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
ट्रंप के इस भव्य स्वागत में एकबारगी हावडी मोदी कार्यक्रम की यादें ताजा कर दी, मोदी जी के पिछले साल हुए अमेरिकी दौरे पर उनका भव्य स्वागत हुआ था और मोदी और ट्रंप की शानदार केमिस्ट्री सबको देखने को मिली, साल 2015 में भी अमेरिकी प्रेजिडेंट ओबामा भारत आये थे लेकिन जितनी गर्मजोशी आज देखने को मिल रही है वो तब न थी।
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मोदी जी के साथ साझा बयान और बाद में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने जो बाते कही वो साफ़ इस और इशारा करती है कि वो भारत अमेरिकी संबंधो को एक नयी ऊंचाई पर ले जाने को तत्पर है और यही कारण है कि नागरिकता कानून और कश्मीर जैसे नाजुक मसलों पर बोलने की बजाय उन्होंने उसे टालना उचित समझा। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर इंडिया की तारीफ़ की वही नागरिकता कानून को आंतरिक मसला बताया और हो सकता है एक बहुत बड़े वर्ग को इससे निराशा भी हुई हो।
कई लोग यह उम्मीद लगाकर बैठे थे कि नागरिकता कानून पर दिल्ली में उपजी हिंसा और कश्मीर के ताजा हालात पर ट्रंप कुछ बोलेंगे और वो मोदी सरकार को घेर पाएंगे लेकिन उन्हें ट्रंप के बयान ने खासा निराश किया होगा। साल 2002 में जब तत्कालीन प्रेजिडेंट बिल क्लिंटन भारत आये थे तब अटल बिहारी वाजपेयी ने घोषणा की थी, ” भारत और अमेरिका स्वाभाविक सहयोगी है ” और आज 2020 में दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम में जब मोदी जी यह कहते है कि भारत और अमेरिका का सहयोग 21वी सदी में दुनिया की दिशा तय करेगा तो यह अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
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अपनी प्रेस वार्ता में ट्रंप ने भारत को साथ रखने की बात कहते हुए एक ” संतुलित हिन्द प्रशांत एरिया” को लेकर भारत का साथ लेनी की बात कही वही व्यापक व्यापार सौदे को लेकर भी साथ चलने की बात कही, यहां यह ध्यान देना बहुत ज़रूरी है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद भारत का अमेरिका को निर्यात बढ़ा है वही दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे में भी कमी आयी है।
भारत और अमेरिका ने करीब तीन अरब डॉलर के रक्षा सौदों पर मोहर लगायी है और ट्रंप ने साफ़ शब्दों में कहा की अमेरिका भारत को सबसे शानदार और घातक, उन्नत हथियार देने को सदैव तत्पर है और रहेगा। दरअसल अमेरिका के भारत के जबरदस्त सहयोगी बनकर उभरने के पीछे भी कुछ कारण है, अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ एक प्रतिरोधी शक्ति के रूप में देखता है, अगर जनसंख्या और आर्थिक क्षमता के आधार पर देखे तो सिर्फ भारत ही है जो चीन को कड़ी टक्कर देने की क्षमता रखता है।
भारत का चीन के साथ सालों से सीमा विवाद है वही चीन और पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए हितकर नहीं है, मसूद अज़हर को बार बार बचाने का काम चीन करता आया है, व्यापारिक दृष्टि से देखे तो ऑटो, तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भारत चीन पर निर्भर हो गया है और भारत और चीन का व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है और अब समय आ गया है कि अमेरिका से मिल रही तवज्जों का इस्तेमाल किया जाए और चीन को अच्छे से घेरा जाए।
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हालांकि हमें यह भी देखना होगा की कई जगह भारत और अमेरिका के संबंधों में असमानता दिखाई देती है, ईरान और रूस के केस में हम इसे समझ सकते है, ईरान पर अमेरिका प्रतिबंध लगा चुका है और रूस से उसकी दुश्मनी तो जग जाहिर है ही लेकिन इसके बाद भी भारत ने इन दोनों देशों से लेंन देन कम नहीं किया, भारत अमेरिका से रक्षा सौदे कर रहा है वही रूस से S 400 मिसाईल की डील भी कर रहा है। वही अमेरिका के भी पाकिस्तान के साथ संबंध ठीक ठाक ही है क्यूंकि अफगानिस्तान में अब कोई ओसामा बिन लादेन पैदा हो जाए ऐसे हालात नहीं है।
अगर आतंकवाद की बात करे तो मोदी जी की मौजूदगी में ट्रंप ने यह प्रतिबद्धता दोहराई की वो और भारत मिलकर कट्टर इस्लामिक आतंकवाद से निपटने को तैयार है, वही मोदी जी ने कहा की जो देश आतंकियों के समर्थक है उन्हें ज़िम्मेदार ठहराने के लिये हमें और आगे बढ़ने की जरूरत है। संकेत यह भी दिये जा रहे है कि चीन के साथ ट्रेड वार शुरू करने के बाद हो सकता है कि अमेरिका का अगला और बड़ा ट्रेड पार्टनर भारत ही हो और अमेरिका अगर इस दिशा में आगे बढ़ता है तो इससे अच्छी बात क्या होगी ?
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अगर हम प्रधानमंत्री मोदी के नज़रिये से देखे तो इस यात्रा का सबसे सुखद परिणाम उनकी प्रतिष्ठा बढ़ना रहा, लगभग दुनिया के हर बड़े अखबार ने प्रमुखता से उनकी तारीफ़ की और उन्हें वर्ल्ड लीडर की तरह पेश किया वही मोदी जी ने भी ट्रंप के इस दौरे को सफल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
अंत में, भारत और अमेरिका के संबंध आज एक ऐसे दौर में है जहां दोनों देशों को आगे आकर रक्षा, तेल, ऊर्जा और तकनीक के आपसी सहयोग से आपसी भागीदारी बढ़ानी होगी और चीन का विकल्प बनना होगा और अगर अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए इससे सुखद कुछ नहीं होगा।