{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
पिछले लेख में आपने स्वर्ग की छठी सीढ़ी के बारे में पढ़ा। इस समय व्यक्ति को अपनी पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी को निभाना होता है। इस चक्र में जीवन में जो कमाया और जो खर्चा किया उसका हिसाब किताब करने के बाद तीर्थ स्थलों की यात्रा करने का समय होता है।
इस जीवन काल में मनुष्य अपने बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश करता है। हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य से अपने बच्चों को कुछ ना कुछ बना देता है। वो चाहे किसान हो या कोई बड़ा अधिकारी ! इसी दौरान अपनी संतान को अच्छे संस्कार देना भी जरुरी होता है।

इसके बाद आती है जीवन की सबसे अंतिम और आखिरी सातवीं सीढ़ी, इसक अर्थ वह है कि मनुष्य अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में आ गया है और जीवन भर जो उसे प्राप्त हुआ इसे ईश्वर की इच्छा मानकर उसे जीवन को समझना होता है।
जब शरीर बूढ़ा हो जाता है तो शरीर कमजोर हो जाता है। शिथिल पड़ने लगता है। व्यक्ति अब दूसरों का सहारे रहता है। इस पड़ाव में इंसान को चाहिए की वो सिर्फ ईश्वर की आराधना करे।
पुराने समय में राजा महाराजा वन में जाते थे लेकिन इस समय मनुष्य को चाहिए की वो मंदिरों में या साधु संतों के साथ ही संन्यास की यह अवधि पूर्ण करे।