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28 साल का जुल्म सड़कों पर: ‘मजदूरों की उम्मीदों की अर्थी’, सिस्टम पर बड़ा सवाल

यह प्रदर्शन सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों मजदूरों की पीड़ा की आवाज थी, जो 1998-99 में मिल बंद होने के बाद से आज तक अपनी पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य बकाया के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

By: Naredra 
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28 साल का जुल्म सड़कों पर: ‘मजदूरों की उम्मीदों की अर्थी’, सिस्टम पर बड़ा सवाल

बुरहानपुरः अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर जहां पूरी दुनिया मजदूरों के सम्मान की बात कर रही थी, वहीं मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने सिस्टम की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया। बुरहानपुर मजदूर यूनियन के बैनर तले बहादरपुर सूत मिल के मुख्य गेट पर मजदूरों ने ‘उम्मीदों की अर्थी’ निकालकर 28 साल के इंतजार और दर्द को सड़कों पर उतार दिया।

यह प्रदर्शन सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों मजदूरों की पीड़ा की आवाज थी, जो 1998-99 में मिल बंद होने के बाद से आज तक अपनी पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य बकाया के लिए दर-दर भटक रहे हैं। यूनियन अध्यक्ष ठाकुर प्रियांक सिंह ने कहा कि यह अर्थी उन मजदूरों की भी है, जो अपना हक पाए बिना ही इस दुनिया से चले गए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक फाइलों में दबकर मजदूरों का भविष्य खत्म हो गया है।

प्रियांक सिंह ने सरकार को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि जब इंदौर की हुकुमचंद मिल के मजदूरों को 224 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा सकता है, तो बुरहानपुर के मजदूरों के साथ भेदभाव क्यों? उन्होंने मांग की कि मिल की जमीन का निस्तारण कर मजदूरों के बकाया करीब 56 करोड़ रुपये का जल्द भुगतान किया जाए।

प्रदर्शन के दौरान विनोद लौंढे समेत कई मजदूर नेताओं ने प्रशासन पर मजदूरों के अधिकार कुचलने का आरोप लगाया। गुस्साए मजदूरों ने ‘मजदूर एकता जिंदाबाद’ और ‘हमारा हक हमें दो’ के नारों से पूरे इलाके को गुंजा दिया।

यूनियन ने साफ चेतावनी दी है कि अगर 15 दिनों के भीतर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो मजदूर राजधानी भोपाल पहुंचकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे।

यह प्रदर्शन सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ बिगुल है जो सालों से मजदूरों की आवाज को अनसुना कर रहा है। अब देखना होगा कि सरकार इस ‘उम्मीदों की अर्थी’ को न्याय में कब बदलती है।

बुरहानपुर से संवाददाता राजवीर राठौर की रिपोर्ट

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