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28 साल का जुल्म सड़कों पर: ‘मजदूरों की उम्मीदों की अर्थी’, सिस्टम पर बड़ा सवाल

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यह प्रदर्शन सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों मजदूरों की पीड़ा की आवाज थी, जो 1998-99 में मिल बंद होने के बाद से आज तक अपनी पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य बकाया के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

अपनी पीड़ा बताने जनसुनवाई में पहुंचा लाचार युवक, बेपरवाह सिस्टम ने नहीं सुनी बात!

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खेरू का दावा है कि उसने पिछले तीन वर्षों में दिन-रात मजदूरी कर भांजे की शादी के लिए करीब 5 लाख रुपये जोड़े थे, लेकिन यह उम्मीद उस वक्त टूट गई जब टोल टैक्स के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उसे रोककर पूरी रकम छीन ली!