{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
पिछले लेख में आपने पढ़ा की पहली सीढ़ी है बच्चे का जन्म लेना, उस दौरान बच्चा गर्भावस्था के प्रवेश द्वार से अनेक कष्टों को सहन कर दुनिया में आता है। और वही से प्रकृति द्वारा रचित नौ ग्रहों का कार्य शुरू होता है।
जन्म लेते ही उसके अच्छे बुरे कार्यों के लेखे जोखे के आधार पर उसके जीवन का भाग्य निर्माण होता है। और उसी के हिसाब से जीवन में सुख दुःख प्राप्त होते है। जिस लग्न में उसका जन्म हुआ उसी के योग के अनुसार उसे जीवन में हानि लाभ, यश अपयश प्राप्त होता है।

उसके बाद शुरू होती है दूसरी सीढ़ी, जब बच्चा अपने जन्म लग्न के उपरांत सुख और दुःख को भोगने के योग्य बन जाता है। वहीं दूसरी और अपने बच्चे को देखकर माता पिता को हर्ष होता है।
सामुद्रिक शास्त्र में भी इस बात का वर्णन है कि मनुष्य का प्रारब्ध पहले रचा जाता है उसके बाद उसके शरीर का निर्माण किया जाता है और माता पिता के सुखों के साथ भी बच्चे का बंधन हो जाता है।
धीरे धीरे बच्चा अपने माता पिता को जानने और समझने लगता है। वो परिवार के और सदस्यों को देखकर प्रसन्न हो जाता है और इस प्रकार उसी इन्द्रिया काम करना शुरू करती है।
धीरे धीरे बच्चे के मन में चंचलता आने लगती है। वो वस्तुओं को देखने और पहचानने लगता है। उसकी रूचि का विकास होने लगता है और अनेक बाते समझने लगता है।