{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
पिछले लेख में आपने चौथी सीढ़ी के बारे में पढ़ा जिसमें बालक किशोर अवस्था में होता है और युवा अवस्था के करीब होता है। इसी समय में उसके द्वारा किये गए काम उसके भविष्य का रास्ता तय करते है।
इसके बाद आती है पांचवी सीढ़ी, इसमें इंसान का वास्तविक जीवन शुरू होता हैं। दरअसल उसने जो ज्ञान अर्जित किया होता है उसे अपने कर्मों से सार्थक करना होता है ताकि उसका जीवन सफल हो सके।

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इसी उम्र में इंसान का पारिवारिक जीवन शुरू होता है। उसका विवाह होता है। इसके बाद वो सारे सुख भोगते हुए आगे के जीवन की रूपरेखा तैयार करता है।
इस दौरान उसे सारे कर्म करते हुए अपने परिवार, समाज और देश के लिए तैयार रहना होता है। अपने माता पिता के सपनों को पूरा करने का समय भी यही होता है।
सभी आपदाओं को सहते हुए उसे अपने कर्मों को करना होता है। ये सभी ज़िम्मेदारी आपके ऊपर है और इसके लिए हर विपत्ति से लड़ना चाहिए। नियमानुसार अपने सभी समबंधो का पालन करना चाहिए।