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30 साल बाद घर लौटेगा एवरेस्ट का ‘ग्रीन बूट्स’, भारतीय पर्वतारोही दोरजे मोरुप के शव की होगी तलाश

माउंट एवरेस्ट पर करीब 30 साल से मौजूद ‘ग्रीन बूट्स’ नाम से पहचाने जाने वाले शव की पहचान अब भारतीय पर्वतारोही लांस नायक दोरजे मोरुप के रूप में की जा रही है। 1996 के एवरेस्ट अभियान में उनकी मौत हुई थी। भारत अब हाई-एल्टीट्यूड रिकवरी टीम की मदद से उनके अवशेषों को वापस लाने की तैयारी कर रहा है।

By: Nivedita 
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30 साल बाद घर लौटेगा एवरेस्ट का ‘ग्रीन बूट्स’, भारतीय पर्वतारोही दोरजे मोरुप के शव की होगी तलाश

माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई पर करीब तीन दशकों से एक शव पर्वतारोहियों के लिए रहस्यमयी और भयावह पहचान बना हुआ है। हरे रंग के जूतों के कारण इसे ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से जाना जाता है। अब भारत इस शव को एवरेस्ट से नीचे लाकर उसके परिवार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है।

अब दोरजे मोरुप का शव माना जा रहा है

कई वर्षों तक ‘ग्रीन बूट्स’ के शव को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के पर्वतारोही त्सेवांग पालजोर का माना जाता था। हालांकि, 2026 में सामने आई सरकारी जानकारी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसकी पहचान लांस नायक दोरजे मोरुप के रूप में की गई है। दोनों 1996 के उसी भारतीय एवरेस्ट अभियान का हिस्सा थे।

1996 के अभियान में आया था भयानक तूफान

मई 1996 में छह सदस्यीय ITBP दल एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने के अभियान पर गया था। मौसम खराब होने के बाद दल के तीन सदस्य वापस लौट गए, जबकि दोरजे मोरुप, त्सेवांग पालजोर और त्सेवांग समनला आगे बढ़ते रहे। शिखर की ओर बढ़ने के बाद वापसी के दौरान तीनों खराब मौसम और बर्फीले तूफान की चपेट में आ गए। वे वापस नहीं लौट सके। यह हादसा एवरेस्ट पर 1996 के सबसे चर्चित और जानलेवा अभियानों में शामिल रहा।

परिवार को तीन दशक से था इंतजार

दोरजे मोरुप के परिवार के लिए यह इंतजार बेहद लंबा रहा है। उनके परिजनों को वर्षों तक उनके शव के बारे में निश्चित जानकारी नहीं मिल सकी। परिवार ने बाद में बिना शव के ही अंतिम संस्कार की धार्मिक रस्में पूरी कर दी थीं। मोरुप की पत्नी कोंचक यांग्सकिट ने बताया था कि अभियान पर रवाना होने से पहले उनके पति ने परिवार की देखभाल करने और लौटने पर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने की बात कही थी। उनके मुताबिक, उस समय उन्हें अनहोनी की आशंका भी हुई थी।

 

शव वापस लाना आसान नहीं होगा

एवरेस्ट के 8,000 मीटर से ऊपर के हिस्से को ‘डेथ जोन’ कहा जाता है। यहां बेहद कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड, खड़ी चढ़ाई और बदलता मौसम किसी भी बचाव अभियान को बेहद जोखिम भरा बना देते हैं। शव को नीचे लाने के लिए विशेषज्ञ हाई-एल्टीट्यूड टीम की जरूरत होगी। हेलीकॉप्टर से इस ऊंचाई पर शव निकालना व्यावहारिक नहीं माना जाता, इसलिए अभियान में पर्वतारोहियों को ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

भारत ने शुरू की रिकवरी टीम की तलाश

ITBP ने इस चुनौतीपूर्ण अभियान के लिए हाई-एल्टीट्यूड रिकवरी विशेषज्ञों की तलाश शुरू की है। शव एवरेस्ट के तिब्बती हिस्से में स्थित होने के कारण अभियान के लिए चीन की अनुमति और समन्वय भी जरूरी है।

परिवार के लिए खत्म हो सकता है तीन दशक का इंतजार

यदि रिकवरी अभियान सफल रहता है तो करीब 30 साल बाद दोरजे मोरुप के अवशेष उनके परिवार तक पहुंच सकेंगे। इससे न सिर्फ परिवार को अंतिम विदाई का अवसर मिलेगा, बल्कि एवरेस्ट के सबसे चर्चित ‘ग्रीन बूट्स’ रहस्य से जुड़ा एक लंबा अध्याय भी समाप्त हो सकता है।

 

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