आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है, नेताजी सिविल सर्विस छोड़ने के बाद भारतीय राष्ट्रय कांग्रेस के साथ जुड़े लेकिन यहां वो महात्मा गांधी जी के अंहिसा के विचारों से सहमत नहीं थे।
बात करते हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन के बारे में, उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई उड़ीसा के कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट कॉलेज से शुरू की। इसके बाद उनकी उच्च शिक्षा कलकत्ता के प्रजेडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। जिसके बाद सुभाष चंद्र बोस के माता- पिता ने इंडियन सिविल सर्विसेस की तैयारी के लिए उन्हें 15 सितंबर 1919 को इंग्लैंड भेज दिया जहां उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। ब्रिटिश शासन के दौरान किसी भी भारतीय का सिविल सर्विसेज में जाना उस वक्त बहुत ही कठिन माना जाता था, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।
लेकिन 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार मिलने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ली और भारत वापस आ गए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। लेकिन यहां सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे।
क्योंकि महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल को मानने वाले थे। इस तरह महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस दोनों के ही विचार अलग- अलग थे। लेकिन महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस दोनों ही जानते थे की उनका मकसद एक ही है, देश की आजादी। सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस ही वह शख्स थे जिन्होने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहकर बुलाया था।
1938 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए लेकिन उनका चुना जाना गांधीवादी विचारधारा के अनुकूल था। महात्मा गांधी ने इसे अपनी हार के रूप में ले लिया। उन्होंने कहा कि ये बोस की जीत है और मेरी हार है और ऐसा लगने लगा की वो कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गांधी जी के इस विरोध के कारण विद्रोही अध्यक्ष ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। जिसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।