प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अपने ऐतिहासिक भाषण में राम मंदिर बनाने का एलान किया है और 500 साल से चले आ रहे इस विवाद को समाप्त किया। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को राम मंदिर के पक्ष में निर्णय दिया था और सरकार से ट्रस्ट बनाने की बात कही थी जिसकी जानकारी आज खुद PM मोदी ने संसद में दी है।
आज मोदी जी ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि वो एक ऐसे मुद्दे पर बात कर रहे है जो की उनके दिल के बेहद करीब है। उन्होंने कहा कि आज सुबह हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं.
मेरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार श्रीराम जन्मस्थली पर भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण के लिए और इससे संबंधित अन्य विषयों के लिए एक वृहद योजना तैयार की है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार एक स्वायत्त ट्रस्ट ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया है. ये ट्रस्ट अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मस्थली पर भव्य और दिव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण और उससे संबंधित विषयों पर निर्णय लेने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र होगा.
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार गहन विचार-विमर्श और संवाद के बाद अयोध्या में पांच एकड़ ज़मीन सुन्नी वक़्फ बोर्ड को आवंटित करने का अनुरोध उत्तर प्रदेश सरकार से किया गया. इस पर राज्य सरकार ने भी अपनी सहमति प्रदान कर दी है.
मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कि भगवान राम ने जिस शबरी के झूठे बेर खाये वो नीची जाति से थी उसके बाद भी राम उसे मुक्ति देते है और उससे कहते है कि मेरी भक्ति को वही पा सकता है जिसे मेरे ऊपर विश्वास है। शायद इसी प्रसंग को ध्यान में रखते हुए आज सरकार ने घोषणा की है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी होंगे जिसमें से एक ट्रस्टी हमेशा दलित समाज से रहेगा.
इसके अलावा सरकार ने फ़ैसला किया है कि अयोध्या क़ानून के तहत अधिग्रहित संपूर्ण भूमि जो लभगग 67.703 एकड़ है और जिसमें भीतरी और आंगन भी शामिल है, उसे नवगठित ट्रस्ट ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ को हस्तांरित किया जाएगा.
दरअसल आज जिस राम मंदिर का सपना सच होते हुए हम देख रहे है उसका इतिहास 500 साल से भी अधिक पुराना है। इतिहास गवाह है कि 1526 में बाबर भारत आया और 1528 आते आते उसका साम्राज्य अयोध्या तक आ गया और उसके बाद उसके सेनापति मीर बांकी ने राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनायीं।
इस मामले पर विवाद तब शुरू हुआ जब 1949 में मस्जिद के अंदर राम जी की मूर्ति मिली, मुस्लिमों का आरोप था कि हिन्दुओं ने इसे रख दिया है, उसके बाद सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर ताला लगवा दिया.
1984 में विश्व हिन्दू परिषद की अगुवाई में राम मंदिर की लड़ाई एक बार फिर शुरू हुई, गोरखनाथ धाम के महंत अवैद्यनाथ ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति बनाई. अवैद्यनाथ ने अपने शिष्यों और लोगों से कहा था कि उसी पार्टी को वोट देना जो हिंदुओं के पवित्र स्थानों को मुक्त कराए. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.
1990 आते आते राम मंदिर की मांग जोर पकड़ने लगी थी और बीजेपी का राष्ट्रीय स्तर पर उदय हो रहा था और लोग बड़ी उम्मीद से हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी की और देख रहे थे, और उसी राम मंदिर की लहर पर सवार होकर आडवाणी जी ने रथ यात्रा का एलान किया जिसके सारथी आज देश के प्रधानमंत्री है।
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली लेकिन इसका विवादों से नाता जुड़ता गया, इस रथ यात्रा का प्रभाव देश में ऐसा था कि हज़ारों कार सेवक अयोध्या पहुंच गए, जिसके कारण गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में दंगे भड़क उठे।
23 अक्टूबर को बिहार में लालू यादव ने जो की उस वक़्त के मुख़्यमंत्री थे उन्होंने आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया जिसके बाद बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
इस मंदिर और मस्जिद की लड़ाई में एक ऐसा मोड़ भी आया जिसने इस देश के इतिहास को पलट कर रख दिया, दरअसल 30-31 अक्टूबर 1992 को धर्मसंसद में कारसेवा की घोषणा की गई, स रोज हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दी. अस्थाई राम मंदिर बना दिया गया.
इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इसके तहत विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा दिया गया. इसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े को मिला.
लेकिन इस निर्णय से कोई भी पक्ष सहमत नहीं था और इस निर्णय के विरोध में कुल 14 याचिका दाखिल की गयी, और नौ मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई और यह मसला एक बार फिर कानूनी लड़ाई में उलझ गया।
कांग्रेस सरकार में यह मुद्दा लटका ही रहा लेकिन साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही इस मामले में तेजी आना शुरू हुई और साल 2017 में योगी जी के CM बनने के बाद उन्होंने सारी कानूनी अड़चने दूर की। जिसके कारण एक बार फिर इसकी सुनवाई शुरू हुई।
पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 के अपने पहले इंटरव्यू में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश पर फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लिया जा सकता है, इसके बाद 8 मार्च 2019 को कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा. पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा.
इसके बाद 2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा. 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अपंने ऐतिहासिक निर्णय में पूरी राम जन्मभूमि राम लला विराजमान को दे दी थी और सरकार को आदेश दिया था कि वो 5 एकड़ ज़मीन मुस्लिमों को दे।
अपने आदेश में कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि वो 3 महीने के अंदर राम मंदिर के निर्माण को लेकर ट्रस्ट का एलान करे और आज खुद PM मोदी ने इसका एलान किया और उस हर कारसेवक के सपने को पूरा किया जिनकी आंखो में एक ही सपना था और वो था राम मंदिर।