केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के दूसरे टर्म का दूसरा बजट 1 फरवरी को पेश करेंगी, तो पुरे देश की नज़र उनपर रहेंगी। क्योंकि आम चुनाव में बड़ी जीत के साथ केंद्र की सत्ता में आने वाले मोदी सरकार के लिए यह बजट किसी चुनौती से कम नहीं होगा। क्योंकि मोदी सरकार ऐसे समय में यह बजट पेश कर रही है जब देश में आर्थिक मंदी की चर्चा अपने शबाब पर है। देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है। कई आंकड़े भी ऐसे हैं जो इसका साफ-साफ संकेत दे रही है। ऐसे में केंद्र सरकार के सामने बजट के माध्यम से करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं पर खड़ा उतरने की चुनौती होगी। क्योंकि सुस्ती के दौर से गुजर रही इकॉनमी के लिए रिफॉर्म का रास्ता खोलने की बड़ी जिम्मेदारी भी सरकार पर होगी।
इस समय प्रॉडक्शन से लेकर डिमांड तक पिछले करीब दो दशकों के खराब दौर से गुजर रहा है। हलांकि सरकार ने शुरू में ही इसे अल्पकालिक बताया था, लेकिन हालात दिनों-दिन खराब होता चला गया। पिछले दो सालों में देश की आर्थिक विकास दर में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। देश में महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर लोगों में निराशा तेजी से बढ़ी है। सरकार के इस बजट से पहले आए तमाम आर्थिक सर्वे को अगर देखें तो सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। ग्रामीण इलाकों में किसानों की स्थिति दयनीय है और वो केंद्र की सरकार से बड़ी राहत की अपेक्षा कर रहे हैं। युवाओं में बेरोजगारी की तादाद काफी बढ़ी है। वहीं शहरी मिडिल क्लास मोदी सरकार के साथ तो है, लेकिन वह इस बजट से कुछ रिटर्न गिफ्ट की उम्मीद रखता है।
देश का मिडिल क्लास केंद्र की सरकार से आयकर में और ज्यादा राहत की उम्मीद कर रहा है। दूसरी तरफ निवेशक बड़े रिफॉर्म की उम्मीद कर रहा है। प्राइवेट स्कूल में फीस में कंट्रोल को लेकर बजट में प्रवधान की मांग की गई है। सरकार के पास खजाना सीमित है ऐसे में इस बार के बजट में ग्रामीण इलाके से लेकर शहरी इलाके तक में लोगों को एक साथ खुश करने के साथ-साथ राहत पहुंचाना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। इस दोहरे चैलेंज से केंद्र की सरकार किस तरह निपटेगी वह आने वाले 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट मे दिख जाएगा। हलांकि पीएम मोदी ने हाल ही में हुई कई बैठकों के बाद ये संकेत दिए हैं कि वह लोक लुभावन बजट के बजाय आर्थिक मजबूती वाले बजट के पक्ष में हैं।
मौजूदा सरकार को नए बजट में अपने वादों और सामने खड़ी मुसीबत के बीच संतुलन बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती होगी। वित्तिय घाटा में भी लगातार बढ़ने के संकेत मिले हैं, तो दूसरी तरफ ग्लोबल स्तर पर चल रहा ट्रेड वार भारत के लिए और मुश्किल पैदा कर सकता है। इन तमाम चीजों से निबटने के लिए मोदी सरकार को तुरंत मैदान में उतरना होगा। इस बार के बजट पर विपक्षी पार्टियों की भी करीबी नजर है। आम चुनावों में मिली हार के बाद विपक्ष अब यह समझ चुका है कि, मोदी और अमित शाह से मुकाबले के लिए एक मात्र विकल्प आर्थिक पिच ही है जिसके सहारे वो वैतरणी पार कर सकती है।