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कभी बुझाते थे पूरे शहर की प्यास, अब उपेक्षा के शिकार हैं सीहोर के ऐतिहासिक कुएं-बावड़ियां

मध्य प्रदेश सरकार के जल गंगा संवर्धन अभियान के बावजूद सीहोर शहर के ऐतिहासिक कुएं और बावड़ियां उपेक्षा का शिकार बने हुए हैं। कभी शहर की प्यास बुझाने वाले 100 से अधिक कुएं आज गंदगी, कचरे और मिट्टी से पटे पड़े हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अभियान केवल कागजों तक सीमित रह गया है।

By: BS Yadav 
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कभी बुझाते थे पूरे शहर की प्यास, अब उपेक्षा के शिकार हैं सीहोर के ऐतिहासिक कुएं-बावड़ियां

सीहोर: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जल संरक्षण और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन के उद्देश्य से चलाया जा रहा जल गंगा संवर्धन अभियान जिला मुख्यालय सीहोर में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहा है। नदियों, कुओं और बावड़ियों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया यह अभियान शहर में प्रभावी रूप से लागू होता नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अभियान केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित होकर रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर ऐतिहासिक जल स्रोत लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।

सीहोर शहर में एक समय ऐसे अनेक कुएं और बावड़ियां थीं जो पूरे शहर की जल आवश्यकताओं को पूरा करती थीं। आज स्थिति यह है कि शहर के 100 से अधिक कुएं गंदगी, कचरे, मिट्टी और काई से भर चुके हैं। वर्षों से सफाई और संरक्षण नहीं होने के कारण इनकी उपयोगिता लगभग समाप्त हो चुकी है। जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले ये स्रोत अब अपनी पहचान खोते जा रहे हैं।

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शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब पार्वती नदी से पर्याप्त जल आपूर्ति नहीं हो पाती थी, तब स्थानीय लोगों ने आपसी सहयोग और जनभागीदारी से कई कुएं खुदवाए थे। इन कुओं ने वर्षों तक लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया। लेकिन बदलते समय के साथ इनकी अनदेखी शुरू हो गई और अब ये जल स्रोत कचरा घर बनकर रह गए हैं।

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि इन कुओं की नियमित सफाई, गहरीकरण और संरक्षण किया जाए तो इनमें पूरे वर्ष पानी उपलब्ध रह सकता है। इससे आसपास के हैंडपंप और बोरवेल भी रिचार्ज होंगे तथा गर्मियों में उत्पन्न होने वाले जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण भूजल स्तर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

शहर के कई प्रमुख क्षेत्रों में स्थित ऐतिहासिक कुएं उपेक्षा का प्रतीक बने हुए हैं। मंडी क्षेत्र के करीब 15 कुएं लंबे समय से सफाई और संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फ्रीगंज क्षेत्र में नेमी की दुकान के पास स्थित कुएं, गणेश मंदिर के सामने और आसपास के कुएं, गल्ला मंडी की बावड़ी, वर्कशॉप रोड का जीन वाला कुआं तथा वर्कशॉप कॉलोनी के पीछे स्थित कुएं भी बदहाल स्थिति में हैं।

मार्च माह से संचालित जल गंगा संवर्धन अभियान का उद्देश्य जल स्रोतों का पुनर्जीवन, गहरीकरण और अतिक्रमण हटाना था, लेकिन सीहोर में इस दिशा में कोई बड़ा कार्य दिखाई नहीं देता। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन ने ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। ऐसे में अभियान की प्रभावशीलता और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। नागरिकों ने मांग की है कि इन ऐतिहासिक कुओं और बावड़ियों का संरक्षण कर उन्हें फिर से जल संरक्षण की मुख्य धारा से जोड़ा जाए।

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