नई दिल्ली : पिछले कुछ दिनों से नेपाल में जारी सियासी उठापटक केपी शर्मा ओली के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के साथ थम सी गई। हालांकि यह सियासी दांव चाल कितने दिनों तक स्थिर रहेगा, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि तीसरी बार ओली के पीएम बनने के बाद भी उनकी कुर्सी पर संकट बना हुआ है। आपको बता दें कि ओली को गुरुवार को पीएम पद पर फिर से नियुक्त किया गया जब विपक्षी पार्टियां नयी सरकार बनाने के लिए संसद में बहुमत हासिल करने में विफल रहीं।
राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष ओली (69) को गुरुवार रात को फिर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया। बता दें कि इससे तीन दिन पहले हुए प्रतिनिधि सभा में ओली अहम विश्वास मत में हार गए थे। सदन में सोमवार को ओली के विश्वास मत हार जाने के बाद राष्ट्रपति ने विपक्षी पार्टियों को बहुमत के साथ नयी सरकार बनाने के लिए दावा पेश करने के लिहाज से गुरुवार रात नौ बजे तक का समय दिया था।
गुरुवार तक, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी दावेदारी रखने के लिए सदन में पर्याप्त मत मिलने की उम्मीद थी। उन्हें सीपीएन-माओइस्ट सेंटर के अध्यक्ष पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ का समर्थन प्राप्त था। लेकिन ओली के साथ अंतिम वक्त में बैठक करने के बाद माधव कुमार नेपाल के रुख बदलने पर देउबा का अगला प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब टूट गया।
आपको बता दें कि ओली को अब 30 दिन के भीतर सदन में विश्वास मत हासिल करना होगा जिसमें विफल रहने पर संविधान के अनुच्छेद 76 (5) के तहत सरकार बनाने का प्रयास शुरू किया जाएगा। ओली की अध्यक्षता वाली सीपीएन-यूएमएल 121 सीटों के साथ 271 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सबसे बड़ी पार्टी है। वर्तमान में सरकार बनाने के लिए 136 सीटों की जरूरत है।
बता दें कि केपी शर्मा ओली 11 अक्टूबर, 2015 से तीन अगस्त, 2016 तक और फिर 15 फरवरी, 2018 से 13 मई, 2021 तक प्रधानमंत्री रह चुके हैं।