इस देश के बुद्धिजीवी वर्ग को बस वही देखना होता है जो उनके एजेंडे और प्रोपगेंडा को सूट करता हो, मार्च 2017 में जब योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य उप के CM बने तो कुछ मीडिया गिरोह को ये पसंद नहीं आया की एक भगवा धारण करने वाला आदमी कैसे मुख़्यमंत्री बन गया और इसी वामपंथी मीडिया के गिरोह ने राज्य के मुसलमानों को डराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
अभी तक तो योगी जी ने कुर्सी ठीक से संभाली भी नहीं थी और गोरखपुर के अस्पताल से जापानी बुखार से मर रहे बच्चो के आकंड़े सामने आने लगे, इसके बाद से ही मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इसे योगी की नाकामी बता कर उनसे इस्तीफे की मांग करने लगा जबकि सच ये था की उसी जापानी बुखार से मर रहे बच्चो की संसद में आवाज़ उठाने वाले योगी आदित्यनाथ ही थे.
वही सपा सरकार के मुखिया को तो कभी सैफई महोत्सव में कलाकारों को नचाने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी और किसी के CM बनने के बाद अगर ऐसी कोई खबरे आती है तो सब को समझ आता है की ये किसका रिपोर्ट कार्ड है ? योगी का या 5 साल CM रहे अखिलेश यादव का ?
आज योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से पूर्वी उप में जापानी बुखार से मरने वाले बच्चो की संख्या बहुत कम हो गयी है लेकिन यही प्रोपगेंडा मीडिया उनकी तारीफ़ नहीं करेगा क्यूंकि यह उनके एजेंडे को सूट नहीं करता है, इसी मीडिया गिरोह की एक और करतूत सामने आयी CAA के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के मुद्दे पर।
दरअसल देश का विपक्ष नागरिकता कानून पास होते ही देश के मुसलमानों को भड़काने में लगा हुआ है जबकि सच्चाई यह है की इस बिल का देश के मुस्लिमो से कोई लेना देना नहीं है, संविधान की दुहाई देकर देश की संपत्ति को आग लगाने वाले दंगाई मासूम बच्चो को आगे करने से भी नहीं बाज़ आते है।
दरअसल दिल्ली के शाहीन बाग़ में इकठ्ठा हुई भीड़ पर वामपंथी मीडिया ऐसे बावला हुआ जा रहा है की जैसे ये भीड़ देश को किसी बहुत बड़े संकट से बचाने के लिए आगे आयी हो लेकिन सच यह है की पुलिस पर पत्थर फेंके गए, आगजनी की गई, दंगे किए गए और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया लेकिन इस देश को मीडिया को यह सब नहीं दिखाई देता है, उन्हें दिखाई देता है एक महिला की गोद में लेटी हुई एक 20 दिन की नवजात बच्ची जो की मोदी सरकार का विरोध करने आयी हुई है।
आप अब कल्पना कीजिये की एक बच्ची जिसने पैदा हुए 1 महीना भी नहीं हुआ है वो देश के संविधान को बचाने आयी है ? क्या वाकई देश का मीडिया निष्पक्ष है ? लेकिन इसी मीडिया की संवेदनहीनता तब सामने आती है जब कोटा में एक एक करके 1000 बच्चे मर जाते है लेकिन देश की मीडिया को इन बच्चो से मतलब नहीं है !
कश्मीर में सेना के ऊपर पत्थर फेंकने वाले बच्चे मीडिया को भटके हुए लगते है और इनके ऊपर लम्बे चौड़े प्राइम टाइम किये जाते है वही कोटा में एक साल में 1000 बच्चों की मौत हो जाती है, केवल दिसंबर महीने में 100 बच्चों की मौत हो गई है लेकिन देश का मीडिया चुप है !
आप कल्पना कीजिये अस्पताल में सुविधाएं नहीं है, उपकरण नहीं है और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री कहते है की CAA से ध्यान भटकाने के लिए इन सब मुद्दों को उठाया जा रहा है, राज्य के मंत्री के लिए क्या मासूम लोगो की जान क्या इतनी सस्ती है ?
लेकिन अब कोई प्राइम टाइम नहीं कर रहा है, कोई अशोक गहलोत का इस्तीफा नहीं मांग रहा है क्यूंकि वहां बीजेपी की सरकार नहीं है, वहां के मुख़्यमंत्री योगी नहीं है क्यूंकि अगर ऐसा होता तो शायद अब तक तो ना जाने कितने विरोध प्रदर्शन हो गये होते।
कोटा की ख़बर में राज्य सरकार की नाकामी है, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का असंवेदनशील रवैया और कॉन्ग्रेस पर सवाल उठते हैं, इसीलिए मीडिया के लिए यहाँ कोई ख़ास मसाला नहीं ! उधर अगर 20 दिन की बच्ची की बात करे तो उसकी अम्मी के 5 बच्चे है और वो मीडिया अटेंशन का कारण बनती है, क्या 20 दिन की बच्ची से उसकी मर्ज़ी पूछी जा सकती है ? क्या उसे पता है की उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है ? लेकिन देश के वामपंथी मीडिया गिरोह के लिए मसाला तब तक तैयार नहीं होता जब तक की कढ़ाई किसी बीजेपी शासित राज्य की आंच पर न चढ़ी हो।