नई दिल्ली : अक्सर आपने कई खबरों में देखा होगा कि पुरूष या महिला शादी होने के बावजूद भी एक्सट्रा अफेयर में रहते है और समाज से छिपाते हैं। वहीं कई मामले में पुरूष या महिला शादी के बाद भी अपनी पति या पत्नी को तवज्जों देने के बजाये किसी गैर महिला या पुरूष को देते हैं, जिसे वो समाज के सामने कबूल भी करते है। इन सभी घटनाओं के दौरान उन्हें कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद भी वो उस बंधन बंधे रहते है।

एक ऐसा ही मामला यूपी के प्रयागराज की है, जहां एक महिला शादीशुदा होने के बावजूद भी दूसरे पुरूष के साथ संबंध में रह रहीं है। इसे लेकर उसने कोर्ट में अपनी सुरक्षा को लेकर याचिका भी दाखिल की थी। आपको बता दें कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शादीशुदा होते हुए गैर पुरुष के साथ पति-पत्नी की तरह रहना लिव इन रिलेशन नहीं है, बल्कि यह अपराध की श्रेणी में आता है।
उन्होंने कहा कि याची आशा देवी का विवाह महेश चंद्र के साथ हुआ है। दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ है। लेकिन, याची अपने पति से अलग दूसरे पुरुष के साथ पति-पत्नी की तरह रहती है। याची आशा देवी महेश चंद्र की विवाहिता पत्नी है। दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ है। लेकिन याची अपने पति से अलग अरविंद के साथ पत्नी की तरह रहती है। यह लिव इन रिलेशनशिप नहीं है, वरन दुराचार का अपराध है, जिसके लिए पुरुष अपराधी है।
कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा महिला के साथ धर्म परिवर्तन कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना भी अपराध है। अवैध संबंध बनाने वाला पुरुष अपराधी है। उन्होंने कहा कि परमादेश विधिक अधिकारों को लागू करने या संरक्षण देने के लिए जारी किया जा सकता है, किसी अपराधी को संरक्षण देने के लिए नहीं। यदि अपराधी को सुरक्षा देने का आदेश दिया गया है तो यह अपराध को संरक्षण देना होगा।
कानून के खिलाफ कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता। जो पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ लिव रिलेशन में रह रहा है, वह भारतीय दंड संहिता के 494 (पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करना) और 495 (पहले से किए गए विवाह को छिपाकर दूसरा विवाह करना) के तहत दोषी होगा। इसी प्रकार से धर्म परिवर्तन करके शादीशुदा के साथ रहना भी अपराध है।
इस सुनावई के दौरान कोर्ट ने कहा कि परमादेश विधिक अधिकारों को लागू करने या संरक्षण देने के लिए जारी किया जा सकता है। किसी अपराधी को संरक्षण देने के लिए नहीं। यदि अपराधी को संरक्षण देने का आदेश दिया गया तो यह अपराध को संरक्षण देना होगा। कानून के खिलाफ कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता। आपको बता दें कि यह मामला हाथरस, थाना सासनी का है, जहां एक महिला और उसके साथ रह रहे व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
आपको बता दें कि इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति डॉ. वाई के श्रीवास्तव की खंडपीठ ने किया था।