दिल्ली में विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद राजनीतिक दल चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। बीजेपी और कांग्रेस सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को फिर से सरकार में आने से रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपना रही है। लेकिन दिल्ली के चुनावी इतिहास को अगर देखें तो साफ पता चलता है कि बीजेपी या फिर कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए 12 रिजर्व सीटों से गुजरना होगा जो दिल्ली की सियासत में अहम स्थान रखती है। ये वही सीट है जिससे होकर कांग्रेस 1998 से लेकर 2014 तक तीन बार सत्ता को बरकरार रखने में कामयाब रही थी और इन्हीं सीटों से होकर आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली की सिंहासन को हासिल किया था।
राजनीतिक वनवास झेल रही बीजेपी दिल्ली की सत्ता से पिछले दो दशकों से दूर है और हर हाल में बीजेपी संगठन ये चाहती है और सभी का ये सपना है कि दिल्ली में कमल खिले। एक आंकड़े को देखे तो साफ पता चलता है कि साल 1993 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी दिल्ली की 70 में से 49 सीटों पर जीत दर्ज की थी और सरकार बनाने में कामयाब रही थी। उस समय दिल्ली में अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए 9 सीटें रिजर्व थी जिसमें से बीजेपी ने 5 सीटों पर अपना परचम लहराया था। लेकिन उसके बाद हालात बदल गए। पिछले 15 से 20 सालों को देखे तो इस दौरान हुए चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है।
हलांकि 2019 के लोकसभा के चुनावों में इन्हीं सीटों पर बीजेपी को भारी जीत मिली थी। अगर बीजेपी को दिल्ली में सत्ता काबिज़ करने का सपना है तो उसे हर हाल में इन रिजर्व सीटों पर अपनी जीत दर्ज करनी होगी क्योंकि ये सीटें कभी कांग्रेस के पास थी जो बाद में आम आदमी पार्टी के पाले में चली गई। अभी आलम यह है कि सभी राजनीतिक पार्टियों की नजर इन्हीं रिजर्व सीटों पर है और सभी यही चाहते हैं की यहां ज्यादा से ज्यादा मेहनत किया जाए। क्योंकि इन सीटों पर वर्तमान में आम आदमी पार्टी का कब्जा है जिसे बीजेपी और कांग्रेस हर हाल में पाना चाहती है।
साल 2013 के विधानसभा चुनावों को अगर हम देखें तो दिल्ली की 12 रिजर्व सीटें में से 9 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने कब्जा किया था लेकिन 2015 में जब दूसरी बार फिर चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी ने इन सभी सीटों को अपने पाले में करने में कामयाबी हासिल की। अब दिल्ली में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और अब सभी पार्टी जीत के रिकॉर्ड को बरकरार रखना चाहती है। पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी का रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा था और वह 70 में से 67 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी। आम आदमी पार्टी पिछले काफी समय से जनता के बीच शिक्षा के सुधारों का मुद्दा बनाया है। पार्टी का कहना है कि उनकी सरकार की नीतियों के कारण गरीबों, वंचितों और युवाओं को काफी फायदा मिला है। इसलिए पार्टी शिक्षा का मुद्दा इस चुनाव में लेकर जरूर उतरेगी।
दूसरी तरफ अगर कांग्रेस की बात करें तो 2015 के चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। हलांकि पिछले नगर निगम के चुनावों और उसके बाद हुए लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के वोट बैंक में काफी इजाफा हुआ था जिसके बाद यह लगने लगा है कि पार्टी इस विधानसभा के चुनावों में अपने परंपरागत वोट बैंक को अपने पाले में करने में सफलता प्राप्त कर रही है। तो दूसरी तरफ कांग्रेस रिजर्व सीटों जो कभी उनके पास थी उसपर वापसी के लिए भी नई रणनीति से काम कर रही है। हलांकि कांग्रेस के पास जनता से वादे करने के लिए कुछ नया नहीं है।
जबकि बीजेपी की अगर बात की जाए तो, तीन दशकों से दिल्ली की सत्ता से बाहर रहने के बाद लगातार कोशिश कर रही है लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। दूसरी तरफ दिल्ली बीजेपी के पास तमाम बड़े नेता हैं जो दिल्ली पर अपना अधिकार समय-समय पर जताते रहे हैं। दिल्ली का सीएम बनने का सपना हर किसी में है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों को अगर देखा जाए तो ये साफ है कि बीजेपी किसी एक को सामने लाकर चुनाव में नहीं उतर सकती है। क्योंकि टिकट बंटवारे के समय होने वाले बवाल को भी रोकना पार्टी के लिए टेढी खीर होगा।