खेती-किसानी में बागवानी एक ऐसा एरिया है जिसमें किसान सीमित जमीन से भी अधिक लाभ कमा सकते हैं। बागवानी से ज्यादा मुनाफा मिले उसके लिए किसानों को सघन पद्धति यानि हाईडेंसिटी बागवानी को अपनाना चाहिए। बागवानी में सघन पद्ति ऐसी तकनीक है जिसमें प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक फलदार पौधों की रोपण कर उससे लगातार कई सालों तक गुणवत्ता वाला फल की अधिक उपज लिया जा सकता है।

हाईडेंसिटी बागवानी में बौनी किस्में लगाई जाती हैं, ताकि प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक से अधिक पौधे लगाए जा सकें। जिससे आप सामान्य बागवानी की तुलना में उतने ही क्षेत्र में अमरूद की बागवानी कर आठ गुना तक उत्पादन ले सकेंगे। आखिर इतना फायदा देने वाली बागवानी कौन नहीं करना चाहेगा?

अगर आप अमरूद की सघन बागवानी करना चाहते हैं तो अमरूद के पौधों को 3 बाई 3 मीटर की दूरी पर लगाएं। इस तरह से पौधों का रोपण करने पर एक हेक्टेयर में 1111 पौधे लगेंगे। अमरूद की पौध रोपाई के कुछ समय बाद सबसे पहले 70 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट दें। उसके बाद दो-तीन महीने में पौध से चार-छह मजबूत डालियां विकसित होती हैं।

अमरूद के पौधे में निकलने वाले नए कल्लों में फल लगते हैं। इसलिए पौध में नए कल्लों को विकास करना ज़रूरी होता है। जिसके लिए अमरूद के पौधों की साल में तीन बार कटाई-छंटाई की जाती है। पहली कटाई बाग लगाने के चार-पांच महीने बाद अक्टूबर मे की जाती है। जिसमें तीन-चार टहनियों को चुनकर उसे 50 फीसदी तक काट दिया जाता है।

टहनियों के कटे भाग पर बोर्डो पेस्ट जरूर लगाना चाहिए। दूसरी कटाई फरवरी में और तीसरी कटाई मई-जून में करनी चाहिए। दो वर्षों तक कटाई-छंटाई कर पौधों की संरचना का विकास किया जाता है। इसके बाद तीसरे वर्ष से पौधे फल देना शुरू कर देते हैं।

अमरूद की सघन बागवानी में भी परम्परागत बागवानी की तरह ही 3 साल में पौधों पर फल लगने लगते हैं। लेकिन सघन बागवानी में तीसरे साल से ही परंपरागत बागवानी की तुलना में दोगुनी उपज मिलने लगती है। परंपरागत तरीके से अमरूद की बागवानी करने पर प्रति हेक्टेयर जहां 15 से 20 टन उपज मिलती है वहीं सघन बागवानी में अमरूद का उत्पादन 30-50 टन प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।