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उत्‍तराखंड: प्रदेश में अब अगले विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी

By: RNI Hindi Desk 
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उत्‍तराखंड: प्रदेश में अब अगले विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी

देहरादून:  उत्‍तराखंड में अब अगले विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है। उत्‍तराखंड के अलग राज्‍य के रूप में वजूद में आने के बाद यह पांचवें विधानसभा चुनाव होंगे।

भाजपा इस चुनाव में विजयरथ पर सवार होकर जाएगी और उसकी कोशिश रहेगी कि पिछला चुनावी प्रदर्शन दोहराया जाए। इसके ठीक उलट कांग्रेस की रणनीति रहेगी कि किसी भी तरह अपनी खोई सियासी जमीन को वापस हासिल किया जाए। इसके लिए भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने ही तैयारी शुरू कर दी है।

इन दोनों में से किसकी रणनीति कारगर साबित होगी यह तय करेगा कि वर्ष 2022 के सियासी रण में कौन सी पार्टी, किस पर इक्‍कीस साबित होती है। अलबत्‍ता पहली तीन विधानसभाओं में सूबे की तीसरी बडी सियासी ताकत रही बसपा के अलावा उत्‍तराखंड क्रांति दल किस तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, इस पर भी नजरें रहेंगी।

भाजपा को अलग उत्‍तराखंड राज्‍य बनाने का श्रेय मिला और अंतरिम विधानसभा में बहुमत के कारण पहली अंतरिम सरकार भी भाजपा की बनी।

इसके बावजूद राज्‍य गठन के लगभग सवा साल बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला कांग्रेस को। पांच साल बाद वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बेदखल कर भाजपा ने सत्‍ता में वापसी की।

वर्ष 2012 के चुनाव में बहुमत किसी को नहीं मिला, लेकिन सबसे बडी पार्टी होने के नाते सरकार बनाई कांग्रेस ने। वर्ष 2017 में मतदाता ने फिर भाजपा की सत्‍ता में वापसी करा दी।

तीसरे विधानसभा चुनाव, यानी वर्ष 2012 में कांग्रेस के हाथों मिली शिकस्‍त के बाद से उत्‍तराखंड में भाजपा अत्‍यंत मजबूत होकर उभरी। दरअसल, वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में राजग सरकार के सत्‍ता संभालने के बाद उत्‍तराखंड का सियासी परिदृश्‍य भी बदला।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्‍य की पांचों सीटें जीतीं। यही प्रदर्शन भाजपा ने पांच साल बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी दोहराया।

वर्ष  2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन एतिहासिक रहा। 70 सदस्‍यीय विधानसभा में भाजपा ने 57 सीटों पर जीत हासिल की। अलग राज्‍य बनने के बाद उत्‍तराखंड में यह पहला मौका रहा, जब किसी पार्टी ने तीन-चौथाई से भी ज्‍यादा बहुमत के साथ सत्‍ता पाई। इससे पहले कांग्रेस ही एक बार वर्ष 2002 में 36 के स्‍पष्‍ट बहुमत के आंकडे तक पहुंची।

भाजपा यूं तो पिछले छह सालों से अविजित नजर आ रही है, लेकिन अपनी इस स्थिति को डेढ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखने की चुनौती भाजपा के समक्ष है।

पिछली बार 57 सीटों पर कब्‍जा जमाया था, तो पार्टी के लिए लक्ष्‍य रहेगा कि अगली बार भी वह इस आंकडे के आसपास पहुंचे। यही भाजपा पर सबसे बडा दबाव भी है।

हालांकि चुनाव में उसका मुकाबला पुरानी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से है, लेकिन यह भी सच है कि अपने पिछले प्रदर्शन के कारण भाजपा को खुद से भी मुकाबला करना पडेगा। पिछले चुनाव में कांग्रेस टूट के बाद मैदान में उतरी थी, लिहाजा कमजोर थी, लेकिन ऐसी स्थिति अगले चुनाव में नहीं होगी।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज ने कांग्रेस कर हाथ झटक कर भाजपा का दामन थामा। इसके बाद तो उत्‍तराखंड में कांग्रेस के बिखराव की शुरुआत ही हो गई।

मार्च 2016 में पूर्व मुख्‍यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्‍व में नौ विधायकों ने कांग्रेस छोडकर भाजपा की राह अख्तियार कर ली। मई 2016 में एक अन्‍य कांग्रेस विधायक भी भाजपा में शामिल हो गईं।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव आते-आते कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्‍यक्ष रहे यशपाल आर्य भी भाजपा में चले गए। इसका असर विधानसभा चुनाव में साफ तौर पर दिखा।

कांग्रेस महज 11 सीटों पर जा सिमटी। यह कांग्रेस का चार विधानसभा चुनावों में सबसे कमजोर प्रदर्शन रहा। यही वजह है कि कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि अपने वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में ध्रुवीकृत किया जाए। अब यह विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेगा कि कांग्रेस अपने मकसद कितना कामयाब होगी।

 

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