रिपोर्ट: सत्यम दुबे
नई दिल्ली: वीरप्पन डाकू, नाम सुनते ही दशकों पुरानी हैवानियत की कहानी याद आने लगती है। 1990 के दशक में इसकी हैवानियत भारत ही नहीं विदेशों में भी कुख्यात थी। इस बात को आप इसी से समझ सकतें हैं कि पुलिस के पकड़े जाने के डर से इसने अपने बेटे का गला घोटकर मार डाला था।
18 जनवरी 1952 को वीरप्पन पैदा हुआ था। बड़ा होने के साथ-साथ ये अपनी हैवानियत को भी बडा करने लगा। पुलिस के लिए ये ऐसा नासुरी फोड़ा बन गया था, जिसका न तो ऑपरेशन हो पा रहा था, और न ही दवा यानि पुलिस पकड़ ही पा रही थी। पुलिस को इसकी तलाश करने में 20 साल का समय लग गया। इस दौरान इसने चंदन की तस्करी कर अरबों की संपत्ति बना ली। वीरप्पन ने अपने इस कुख्यात काम के दौरान 2 हजार लोगों की हत्या की थी।
विस्तार से बतातें हैं, इसके जीवन के बारे में
18 जनवरी 1952 को पैदा हुए वीरप्पन का पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था। वीरप्पन के बारे में कहा जाता है कि उसने 17 साल की उम्र में पहली बार एक हाथी का शिकार किया था। वीरप्पन के बारे में एक और चीज कुख्यात थी, वो ये थी कि हाथियों सहित अपने सभी शिकार के सिर के ठीक बीच में गोली मारता था, सिर के बीच में गोली मारना उसे काफी काफी पसंद था।
वीरप्पन को 20 साल तक पुलिस तलाश करती रही, इस बीच में एक वन अधिकारी श्रीनिवास ने इसे गिरफ्तार भी किया था। लेकिन यह अपने चालाकी से पुलिस को चकमा देकर भागने में कामयाब हो गया। इसके बाद इसने योजनाबद्ध तरीके से वन अधिकारी श्रीनिवास की हत्या कर दी। बताया जाता है कि वीरप्पन श्रीनिवासन पर इतना क्रोधित था कि हत्या करने के बाद उसने श्रीनिवासन के सर को काटकर उससे फुटबाल खेला था।
वीरप्पन अपनी क्रुरता के लिए काफी बदनाम था, लेकिन हद तो इसने तबकर दी, जब इसने अपने बेटे की हत्या की थी। कहा जाता है कि साल 1993 में अपने करीब 100 साथियों के साथ जंगल में छिपा था। जहां पुलिस इसकी तलाश कर रही थी। उस वक्त इसके साथ इसका नवजात बेटा भी थी। बेटे के रोने की आवाज से पुलिस इसे पकड़ न ले। इस वजह से वीरप्पन ने अपने ही नवजात बेटे का गला घोंटकर हत्या कर दी थी। इसके क्रुरता की हद से सभी कांपते थे।
आपको बता दें कि वीरप्पन का शिकार ज्यादातर पुलिस वाले होते थे। कहा जाता है कि वीरप्पन को ऐसा लगता था कि उसके परिवार वालों को जिसमें उसकी बहन और भाई शामिल है, पुलिस ने मारा था। इस कारण वो पुलिसवालों की हत्या कर उनसे बदला ले रहा था। कई सालों तक वीरप्पन ने अवैध तस्करी के जरिये करोड़ों की जागीर खड़ी कर ली थी। वो हाथियों का शिकार कर उसकी खाल और दांत बेचता था। साथ ही चन्दन की लकड़ियों की तस्करी कर उससे मिले पैसों से हथियार खरीदता था।
सरकार के लिए वीरप्पन इतना बड़ा सरदर्द हो गया था कि उसको पकड़ने के लिए सरकार ने 734 करोड़ रुपए खर्च किये थे। पुलिस की तरफ से टास्क बनाई जाती थी। उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती थी। लेकिन जब अरेस्ट का मौका आता था, वीरप्पन सबको चकमा देकर निकल जाता था।
वीरप्पन काफी कम समय में अपने गिरोह का हेड हो गया था। इसकी टीम में 40 ऐसे लोग थे, जो उसके लिए जान देने को तैयार थे। वो वीरप्पन के एक इशारे पर किसी की भी जान ले सकते थे।
वीरप्पन को फिल्मों का काफी शौक था। इस खूंखार डाकू के बारे में कहा जाता है कि इसने फिल्म द गॉडफादर को सौ बार से ज्यादा देखा था। इसके अलावा उसे कर्नाटक संगीत भी काफी पसंद था।
वीरप्पन को अपनी मूंछें काफी पसंद थी। उसकी मूंछें उसकी पहचान बन गई थी। बताया जाता है कि उसकी आंख खराब थी। इसी का इलाज करवाने के लिए वह जा रहा था। रास्ते में जाते हुए उसे पुलिस की टास्क ने घेरकर अक्टूबर 2004 में 20 मिनट के ताबड़तोड़ इनकाउंटर के बाद इनकाउंटर करने में सफल हुई थी। पुलिस इनकाउंटर के बाद खत्म हुई थी, इसके क्रुरता की कहानी।