भारत बटेर के मांस उत्पादन में पाँचवें और अण्डा उत्पादन में सातवेँ स्थान पर है। यहां हर साल तकरीबन 32 मिलियन जापानी बटेरों का व्यावसायिक रूप से पालन किया जाता है, कुक्कट पालन व्यवसाय में मुर्गी पालन, बत्तख पालन के बाद इसका तीसरा स्थान है।
यहां ये जानना भी बेहद जरूरी है की अपने देश में 70 के दशक में बटेर पक्षी के संरक्षण के लिये इनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। लेकिन सन् 1974 में जब व्यवसायिक रूप से पाली जाने वाली बटेर की नस्ल जापानी बटेर अमेरिका से लाई गई। तो सरकार ने इससे प्रतिबन्ध हटा लिया।

यही नही भारत में जब पहली बार जापानी बटेर के अंडों को आयात किया गया, तब इनके अण्डे का वजन 7 से 8 ग्राम और चूजों का शरीर भार पांच सप्ताह में मात्र 70 से 90 ग्राम ही था। बीते 38 सालों में बटेर पर बहुत से रिसर्च किए गए हैं, जिसका नतीजा ये निकला कि आज अपने देश में कई नस्लों का विकास किया गया है। जिसका शरीर भार पांच सप्ताह में 130 से 250 ग्राम तक हो जाता है।
वैसे तो बटेर पालन बहुत कम जोखिम वाला व्यवसाय है फिर भी इसके चूज़ों की सही देखभाल ज़रूरी है और इसमें भी उपयुक्त तापमान बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके लिए बटेरों की स्थिति देखकर आप आसानी से निर्णय ले सकते हैं।

शुरूआत में चूजे काफी नाजुक होते हैं,जिससे जोखिम ज्यादा रहता है। ऐसे में प्रारंभिक अवस्था में बटर के चूजों का ज्यादा ख्याल रखना होता है, प्रारंभिक अवस्था में इन्हें ब्रूडर में रखते हैं, एक सप्ताह बाद मृत्यु दर नगण्य हो जाती है जिससे दवा देने की भी ज़रूरत नही होती।
खाने में बटेर को प्रीस्टार्टर राशन मुर्गियों को जो दिया जाता है वही दिया जाता है,बाकी मार्केट में बटेर का फीड भी उपलब्ध है जिसे आप ला सकते हैं एक मुर्गी एक दिन में औसतन 5-10 ग्राम दाना खाती है।

एक बात और महत्वपूर्ण है कि वैसे तो बटेर मीट के लिए पाला जाता है लेकिन इसके अंडों की मांग अगर स्थानीय स्तर पर है तो आप बटेर को बेचने से पहले अच्छी संख्या में इससे अंडे भी प्राप्त कर सकते हैं। यानी दोहरा मुनाफ़ा, हां इसके लिए ज़रूरी है कि स्थानीय लोगों का भ्रम दूर हो कि मुर्गी के अंडे इससे बेहतर होते हैं।
क्योंकि ये साबित हो चुका है कि बटेर के अंडे पोषण के मामले में मुर्गी के अंडों से कहीं से भी कमतर नहीं है। बटेरपालन कैसे एक बेरोज़गार का या फिर आंशिक बेरोजगार का या किसी गृहस्थ का आर्थिक पक्ष मज़बूत कर सकता है। क्योंकि इसमें लागत कम लगती है और मुनाफा ज्यादा होता है।