{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
आज से हज़ारों साल पहले कई समुदायों का जन्म हुआ था। धीरे धीरे इनके अनुयायी बढ़ते गए और आखिर में इन्होने धर्म का रूप धारण कर लिया।
जैन, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई ये सभी धर्म धीरे धीरे जन मानस में प्रसार करते गए और एक अच्छी खासी संख्या इन धर्मों को मानने वालों की हो गयी है।
जिन जिन धर्म ग्रन्थों में जो जो लिखा गया उन्ही सब बातों का इतिहासकारों ने अनुसरण किया है। उस धर्म को मानने वालों ने भी उन्ही सब बातों को माना और समझा।
लेकिन जो सबसे पुराना धर्म है जिसे हम सनातन धर्म कहते है उस धर्म के वेद पुराण उपनिषद में पुनर्जन्म का जिक्र है।

यही दोबारा जन्म नहीं होता तो इस सृष्टि का संचालन करना कितना मुश्किल हो जाता ! अच्छा कर्म करने वाला, बुरे काम करने वाला, दुखी, सुखी, धनवान गरीब सब टाइप के लोग इस दुनिया में है।
अलग अलग प्रकार के लोगों से ही इस संसार का संचालन होता है और यही सत्य है। अगर सभी को एक ही योनि मिल जायेगी तो पृथ्वी का संतुलन कैसे बना रहेगा।
इसलिए मनुष्य को सदैव अच्छे कर्म करना चाहिए ताकि ईश्वर के चरणों में उसे स्थान मिले और एक बार फिर ये मनुष्य देह मिले ताकि अच्छे कर्म कर सके।