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चुनाव नहीं, सिर्फ सहमतिः बुरहानपुर की ‘पिंक पंचायत’ मांजरोद कला में महिलाओं के हाथों लिखा जा रहा विकास का नया इतिहास!

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने कभी यहां चुनाव होते नहीं देखे। हमेशा आपसी सहमति से प्रतिनिधि चुने जाते हैं। यही एकता और महिलाओं की मजबूत भागीदारी इस पंचायत को खास बनाती है।

By: Naredra 
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चुनाव नहीं, सिर्फ सहमतिः बुरहानपुर की ‘पिंक पंचायत’ मांजरोद कला में महिलाओं के हाथों लिखा जा रहा विकास का नया इतिहास!

बुरहानपुर जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत मांजरोद कला आज पूरे क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण की एक अनोखी मिसाल बनकर उभरी है। इस गांव की सबसे खास बात यह है कि देश की आजादी के बाद से यहां कभी पंचायत चुनाव नहीं हुए। हर बार गांव की चौपाल में महिलाएं और पुरुष मिलकर सर्वसम्मति से सरपंच और पंचों का चयन करते हैं।

आज मांजरोद कला को “पिंक पंचायत” के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां सरपंच से लेकर उपसरपंच और सभी 11 वार्डों की पंच महिलाएं हैं। पिछले करीब 9 वर्षों से गांव की बागडोर पूरी तरह महिलाओं के हाथों में है, और उन्होंने विकास की ऐसी मिसाल पेश की है, जो अन्य पंचायतों के लिए प्रेरणा बन रही है।

साल 2022 में भी यहां निर्विरोध चुनाव हुए, जिसमें लाड़की बाई सावलकर को सरपंच चुना गया। उनके नेतृत्व में पंचायत को 15 लाख रुपए का पुरस्कार मिला, जिसे गांव के विकास कार्यों में लगाया गया। आज गांव में पक्की सड़कें, हर घर नल-जल योजना के तहत पेयजल सप्लाई, दो आंगनवाड़ी भवन, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक मंगल भवन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं, आपात स्थिति के लिए ट्यूबवेल, मवेशियों के लिए सार्वजनिक कुंड और नया पंचायत भवन भी निर्माणाधीन है। गांव में 300 परिवार और करीब 1500 की आबादी है, जहां 100% टैक्स वसूली होती है और ग्रामीण एकजुट होकर विकास को प्राथमिकता देते हैं।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने कभी यहां चुनाव होते नहीं देखे—हमेशा आपसी सहमति से प्रतिनिधि चुने जाते हैं। यही एकता और महिलाओं की मजबूत भागीदारी इस पंचायत को खास बनाती है। मांजरोद कला यह साबित कर रहा है कि जब नेतृत्व मजबूत और नीयत साफ हो, तो बिना चुनावी शोर-शराबे के भी विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है।

बुरहानपुर से संवाददाता राजवीर राठौर की रिपोर्ट

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