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गोरखनाथ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा का दूसरा दिन, गुरु महिमा और भक्ति का संदेश

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने भक्ति और गुरु महिमा का संदेश दिया।

By: BS Yadav 
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गोरखनाथ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा का दूसरा दिन, गुरु महिमा और भक्ति का संदेश

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा जारी है। कथा के दूसरे दिन वृंदावन से पधारे कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भक्ति, गुरु महिमा और आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया। इस दौरान उन्होंने गुरु के प्रति समर्पण को जीवन के कल्याण का मार्ग बताया। गोरखनाथ मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को भक्ति और गुरु महिमा का संदेश दिया। कथा के दौरान राधाष्टमी महोत्सव का गीत गाकर उन्होंने श्रद्धालुओं को वृंदावन के छठी महोत्सव की अनुभूति कराई। वहीं गीतावली के उत्तरकांड का एक पद हनुमान जी को समर्पित करते हुए श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

गुरु के प्रति समर्पण से ही जीवन का वास्तविक कल्याण संभव

कथा व्यास ने कहा कि शास्त्र-वचन को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, लेकिन जिस गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया है, वहां तर्क नहीं करना चाहिए। गुरु के बताए मार्ग को स्वीकार करने से ही जीवन का वास्तविक कल्याण संभव है। उन्होंने कहा कि लौकिक वस्तुओं के अभाव की पूर्ति को कल्याण नहीं कहा जा सकता। वास्तविक कल्याण वह है, जिससे आत्यंतिक दुःख की निवृत्ति हो और यह भगवान के चरणों की प्राप्ति से ही संभव है।

भजन के लिए समय जरूर निकालें, आलस्य सबसे बड़ा शत्रु

कथा व्यास ने कहा कि व्यक्ति अपने दूसरे सभी कार्यों में तत्पर रहता है, लेकिन जब भजन की बात आती है तो आलस्य करने लगता है। उन्होंने कहा कि भगवान का भजन ही मनुष्य को भवसागर से पार कराता है। इसलिए जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, भगवान के भजन के लिए समय जरूर निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि आलस्य मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है और इसका त्याग कर भगवान की कथा का श्रवण करना चाहिए।

भजन में पांच दोषों से बचने की दी प्रेरणा

जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने भगवान के भजन में आने वाले पांच प्रमुख दोषों से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने विषयभोग, निद्रा, हंसी, संसार के प्रति अत्यधिक प्रेम और अधिक बात करने को भजन में बाधक बताया। साथ ही कहा कि यदि बुद्धि भगवत्-निष्ठ हो जाए तो काम और क्रोध जैसे विकारों का भी भगवान की भक्ति में उपयोग किया जा सकता है।

गोरक्षा के लिए गोरक्षपीठ के योगदान का किया उल्लेख

कथा व्यास ने कहा कि गोरक्षा की आशा गोरक्षपीठ से ही है और गोरक्षपीठ सदैव गो-रक्षा के लिए कार्य करती रही है। उन्होंने सनातन धर्म और गो-रक्षा के संदर्भ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक समर्थन की अपील भी की। उन्होंने नैमिष तीर्थ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि नैमिष क्षेत्र में कलियुग के दोषों का प्रभाव नहीं है। परम धर्म वही है, जिसके आचरण से भगवान के चरणों की प्राप्ति हो। उन्होंने अहैतुकी भक्ति को परम धर्म बताते हुए कहा कि यह भक्ति किसी कामना के लिए नहीं की जाती।

भगवान के प्रेम में बाधक वस्तु का त्याग जरूरी

कथा व्यास ने कहा कि भगवान का भक्त अपने वैराग्य से कभी संतुष्ट नहीं होता। यदि वह वैराग्य से संतुष्ट होने लगे तो उसका वैराग्य कम होने लगता है और वह भक्ति से च्युत हो सकता है। भगवान के प्रेम में जो वस्तु बाधक हो, वह कितनी भी प्रिय क्यों न हो, उसका त्याग कर देना चाहिए। वहीं जो वस्तु भगवान की भक्ति में सहायक हो, उसे स्वीकार करना चाहिए। इस अवसर पर योगी कमलनाथ जी महाराज, अयोध्या के महंत राजूदास जी, महंत रविंद्रदास जी, ब्लॉक प्रमुख बृजेश यादव, डॉ. सुनीता सिंह, संजय सिंह, प्रदीप राव, डॉ. अरविंद चतुर्वेदी, महेश पोद्दार और विकास जालान सहित बड़ी संख्या में साधु-संत और गणमान्यजन मौजूद रहे। कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ। संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया।

अंकित श्रीवास्तव की रिपोर्ट

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