{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
अभिमान मनुष्य के जीवन में एक अध्याय बनाता है। चाहे जिस उम्र में भी अभिमान आये लेकिन वो मनुष्य को अपने बाहुपाश में जकड़ लेता है। अभिमान आने के बाद इंसान अपमानित होने लगता है और उसके सगे संबंधी भी मुंह मोड़ लेते है।
अभिमानी व्यक्ति अपने स्वभाव के कारण अकेला पड़ जाता है और सब उसे भली भांति समझने लगते है। इसलिए एक व्यक्ति को हमेशा जीवन में अभिमान को त्याग कर ही किसी से बात करनी चाहिए।
कई बार हम समाज में देखते है कि एक व्यक्ति बड़ी अच्छी नौकरी करता है अच्छा बिज़नेस करता है लेकिन उसके पास समय ही नहीं होता है।

उसके पास इतना भी समय नहीं होता की वो समाज में किसी की सेवा कर सके। किसी की मदद कर सके। ऐसे धन को ज्ञानी लोगों ने बेकार ही कहा है।
उस धन का क्या लाभ जो किसी और के काम ना सके ? ऐसा अभिमान किसी काम का नहीं जो आप किसी गरीब की मदद भी न कर पाए।
लेकिन इसको हम ऐसे भी समझ सकते है कि जैसे कोई जिले का कलेक्टर है। अब वो हर किसी के घर तो जा नहीं सकता। ऐसे में उसे अभिमानी नहीं कह सकते।