आदिवासी बहुल जिले बड़वानी के 400 बेड वाले जिला अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल एक बार फिर खुलती नजर आ रही है। अस्पताल परिसर और महिला प्रसूति अस्पताल में करोड़ों रुपये की लागत से लगाए गए तीन ऑक्सीजन प्लांट में से दो पिछले 6-7 महीनों से बंद पड़े हैं, जिससे गंभीर मरीजों और उनके परिजनों की चिंता लगातार बढ़ रही है। स्थिति यह है कि अस्पताल को मजबूरी में निजी ऑक्सीजन प्लांट से सिलेंडर मंगवाने पड़ रहे हैं, जिससे शासन पर हर महीने लाखों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
जिला अस्पताल और महिला अस्पताल में कुल तीन ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए गए थे, जिनकी कुल क्षमता लगभग 7570 लीटर प्रति मिनट है। इनमें से एक लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट (6000 LPM) फिलहाल चालू है, जबकि दो पीएसयू ऑक्सीजन प्लांट बंद पड़े हैं।
इनमें जिला अस्पताल परिसर में लगा 1000 LPM क्षमता वाला प्लांट और महिला अस्पताल में स्थापित 570 LPM क्षमता वाला प्लांट खराब हैं। बताया गया कि एक प्लांट का सेंसर और दूसरे का फिल्टर खराब हो गया है। मरम्मत के लिए कंपनी के इंजीनियर और उपकरण बाहर से मंगाने होंगे, लेकिन इसके लिए आवश्यक फंड अब तक स्वीकृत नहीं हो पाया है।
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है, जब पता चलता है कि जिला अस्पताल के पास खुद की वेंटिलेटर एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं है। गंभीर मरीजों को इंदौर, गुजरात या अन्य बड़े शहरों में रेफर करने के लिए आज भी निजी अस्पतालों की महंगी वेंटिलेटर एम्बुलेंस पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे गरीब और जरूरतमंद मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
शहर निवासी शेख ने बताया कि सरकार अस्पताल भवनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन मूलभूत स्वास्थ्य संसाधनों की कमी आज भी मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर धकेल रही है। गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर एम्बुलेंस जैसी जरूरी सुविधा सरकारी अस्पताल में नहीं होना बेहद चिंताजनक है।
कोविड काल के दौरान ऑक्सीजन की भारी किल्लत देखने के बाद सरकार ने भविष्य की आपात स्थितियों से निपटने के लिए ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए थे। लेकिन बड़वानी जिला अस्पताल में वही प्लांट आज खुद समस्या बन गए हैं। इससे अस्पताल प्रबंधन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आदिवासी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे दावे जमीनी स्तर पर खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं।
सिविल सर्जन मनोज खन्ना ने बताया कि बंद पड़े ऑक्सीजन प्लांट की जानकारी शासन और संबंधित कंपनी को भेज दी गई है। मरम्मत के लिए राज्य स्तर पर पत्र भेजा गया है। जैसे ही फंड स्वीकृत होगा, सुधार कार्य शुरू कर दिया जाएगा। फिलहाल जिला अस्पताल में लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट से और महिला अस्पताल में निजी सिलेंडरों के माध्यम से ऑक्सीजन सप्लाई की जा रही है। वेंटिलेटर एम्बुलेंस के लिए भी राज्य स्तर पर पत्राचार किया गया है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सुरेखा जमरे ने बताया कि जिले में 108 सेवा के अंतर्गत कुल 38 एम्बुलेंस स्वीकृत हैं। इनमें 3 वाहन वर्तमान में बंद हैं, 3 एएलएस (एडवांस लाइफ सपोर्ट), 15 बीएलएस (बेसिक लाइफ सपोर्ट), और 20 जननी वाहन संचालित हो रहे हैं।
जिला अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट और वेंटिलेटर एम्बुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों को उजागर कर दिया है। जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस ओर तत्काल और गंभीर कदम उठाए, ताकि आदिवासी बहुल क्षेत्र के मरीजों को निजी संसाधनों पर निर्भर न रहना पड़े और उन्हें समय पर जीवनरक्षक सुविधाएं मिल सकें।