दुनिया भर में, भोजन वाली मुख्य अनाज फ़सलों में, मक्का के बाद गेहूं, दूसरी सबसे ज्यादा उपजाई जाने वाली फ़सल है। हमारे देश में भी गेहूं की बंपर उपज होती है, क्योंकि यहां की मिट्टी और जलवायु इस फ़सल के लिए काफी अच्छी है। इस कारण किसान बड़े स्तर पर गेहूं की फ़सल लगाते हैं। किसानों की आर्थिक स्थिति काफी हद तक, इस फ़सल पर निर्भर करती है।

खेतों में खड़ी गेहूं की फ़सल के लिए, अभी बेहद संवेदनशील मौसम है। क्योंकि अभी गेहूं में दाने बनने और उसमें दूध भरने का वक्त है। और ऐसे में तापमान का धीरे-धीरे बढ़ना, इसके लिए कई समस्याएं लेकर भी आता है। इस बदलते मौसम में, गेहूं की फ़सल में कई कीट-बीमारियों की आशंका होती है।
तो आज आपको इस लेख में बताते है कुछ ऐसी की बीमारियों के बारे में और कैसे उनसे बचा जाए ताकि किसान भाई अपना उत्पादन बढ़ा सके –

निम्न तापमान और उच्च आर्दता पीला रतुआ के स्पोर अंकुरण के लिए सही होता है। हाथ से छूने पर धारियों से फफूंद के बीजाणू पीले रंग की तरह हाथ में लगते हैं। फसल के इस रोग के चपेट में आने से कोई पैदावार नहीं होती है।
इस बदलते मौसम में गेहूं सबसे ज्यादा पीला रतुआ रोग की चपेट में आता है। इसकी पहचान इसके पत्तों से आसानी से की जा सकती है। जब गेहूं के पत्ते पीले दिखें,और इन्हें छूने पर हाथ में हल्दी पाउडर जैसी चीज़ लगे तो समझें पीला रतुआ का प्रकोप शुरू है।
रोग के लक्षण दिखाई देते ही 200 मिली. प्रोपीकोनेजोल 25 ई.सी. या पायराक्लोट्ररोबिन प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। रोग के प्रकोप और फैलाव को देखते हुए दूसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल में करें।

देश के कुछ हिस्सों में पिछले कुछ वर्षों से, लूज-स्मट रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। इस रोग में गेहूं की बालियों पर काले रंग का पाउडर नज़र आता है। इस रोग में, बाली में दाने की जगह काला चूर्ण भरा होता है, और दाने काले हो जाते हैं। गेहूं की फ़सल में ये रोग लगने पर, संबंधित कीटनाशक का छिड़काव ज़रूरत के मुताबिक़ करना चाहिए।
खेत में धुंआ करके भी फसल को बचाया जा सकता है। रात में 12 से 2 बजे तक खेत के मेड़ों पर कूड़ा-कचरा जलाकर हवा की दिशा में धुंआ करना चाहिए।