गोरखपुर। युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की स्मृति तथा पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित स्मृति व्याख्यानमाला में भारतीय ज्ञान परंपरा पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन पांडुलिपियों और शिक्षा के महत्व पर विस्तार से अपने विचार रखे।
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में विद्वानों और ऋषियों ने हमेशा अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतन किया है। भारतीय ऋषि परंपरा ने ज्ञान की इस विरासत को अलग-अलग माध्यमों से संरक्षित रखने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को भारत की ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रेरित किया। इसके बाद प्राचीन पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों, शिलालेखों और अन्य ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण एवं डिजिटाइजेशन का कार्य आगे बढ़ा।
मुख्यमंत्री ने काशी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के अपने भ्रमण का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां एक लाख से अधिक प्राचीन पांडुलिपियां एकत्रित हैं और उनके संरक्षण तथा डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार का ज्ञान परिवारों, विद्वानों के घरों, प्राचीन मठों और मंदिरों में भी बिखरा हुआ हो सकता है। लंबे समय तक हम इन धरोहरों के महत्व को समझ नहीं पाए, लेकिन अब इनके संरक्षण की आवश्यकता को समाज समझ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन, लखनऊ सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पांडुलिपियां, ताम्रपत्र और शिलालेख उपलब्ध हुए हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन लिपि, मुद्रा, सामाजिक व्यवस्था और उस समय के समाज की अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त होती हैं।

भारतीय शिक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत ने ज्ञान को केवल अक्षर ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा। भारतीय परंपरा में कहा गया है, विद्या सा विद्याया विमुक्तये, अर्थात विद्या वह है जो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में विद्या को परा और अपरा दो रूपों में देखा गया है। अपरा विद्या भौतिक जगत का ज्ञान प्रदान करती है,जबकि परा विद्या मनुष्य को आध्यात्मिक और दिव्य ज्ञान की ओर ले जाती है। दोनों के समन्वय से जीवन के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि औपनिवेशिक काल में भारत की पारंपरिक ज्ञान व्यवस्था को लेकर भ्रम पैदा किया गया। उन्होंने कहा कि संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं और आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के स्थान पर पश्चिमी मॉडल को अधिक महत्व दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय समाज धीरे-धीरे अपनी मूल परंपराओं और जड़ों से दूर होता गया।
काशी में उत्तरवाहिनी गंगा की परंपरा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि गंगा का उत्तर की ओर प्रवाहित होना अपनी मूल दिशा और जड़ों की ओर लौटने का प्रतीक माना गया है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार भारतीय समाज को भी अपनी ज्ञान की मूल धरोहर और जड़ों की ओर लौटकर उन्हें समझने का प्रयास करना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। भाषा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिल्प सहित अनेक क्षेत्रों में भारत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने पाणिनि, पतंजलि, सुश्रुत और चाणक्य जैसे विद्वानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन उपलब्धियों और ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पाणिनि ने हजारों वर्ष पहले व्याकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने पतंजलि, आयुर्वेदाचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को समझने के लिए इन सभी का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने नैमिषारण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में इसे ज्ञान और ऋषि परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्मरण किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीयता का एहसास कराने और ऋषि परंपरा की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित शोध और अध्ययन को आगे बढ़ाया जा रहा है,साथ मुख्यमंत्री ने शिक्षकों, आचार्यों और शिक्षण संस्थानों से आह्वान किया कि प्राचीन ज्ञान और धरोहरों के संरक्षण के साथ वर्तमान पीढ़ी को उनसे परिचित कराने का प्रयास किया जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि हम अपनी ज्ञान परंपरा और पूर्वजों की उपलब्धियों का संरक्षण करते हैं तो यह उनके प्रति वास्तविक कृतज्ञता होगी। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ जोड़कर दुनिया के सामने भारत की विरासत को प्रस्तुत किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर काम करते समय तीन महत्वपूर्ण पक्षों को ध्यान में रखना होगा, सत्य, असत्य और संशय। उन्होंने कहा कि जो भी बात कही जाए, उसे प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। विरोध करने वालों के सामने भी प्रमाण महत्वपूर्ण होंगे और दुष्प्रचार अथवा संशय की स्थिति में तथ्यों के माध्यम से भ्रम दूर करना होगा। मुख्यमंत्री ने आधुनिक तकनीक का जिक्र करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। तकनीक से दूर भागने के बजाय उसका उपयोग भारतीय ज्ञान परंपरा को समयानुकूल तरीके से आगे बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।
अंत में मुख्यमंत्री ने कहा कि प्राचीन काल में भारत की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक संपदा के कारण नहीं थी। भारत ‘विश्वगुरु’ अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा और ज्ञान की धरोहर के कारण कहलाता था। उन्होंने कहा कि आज के अनेक विकसित देशों की आधुनिक समृद्धि का इतिहास कुछ सौ वर्षों का है, जबकि भारत में हजारों वर्ष पहले से उच्च शिक्षा और ज्ञान की परंपरा मौजूद रही है। उन्होंने तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है, साथ ही मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की इस गौरवशाली ज्ञान परंपरा को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री ने उपस्थित संतों, विद्वानों, जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्र-छात्राओं का आभार व्यक्त किया।