{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
पिछले लेख में आपने पढ़ा की स्वर्ग की तीसरी सीढ़ी में बालक धीरे धीरे अपने माता पिता और गुरुओं की बात को सीखने और समझने लगता है। उसके अंदर अच्छाई और बुराई का भेद समझने की ताकत आ जाती है।
जो बच्चे अपने माता पिता के साथ रोज़ मंदिर जाते है, ईश्वर को समझने की कोशिश करते है उन बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। लेकिन जो बच्चे माता पिता और गुरुओं की बातों को मन में नहीं बिठाते है और समझने नहीं है उनका विकास नहीं होता है।
इसके बाद चौथी सीढ़ी का जिक्र होता है जिसमें बालक किशोर अवस्था में होता है और युवा अवस्था के करीब होता है। इसी समय में उसके द्वारा किये गए काम उसके भविष्य का रास्ता तय करते है।

आप गजकेसरी योग में पैदा हुए या गुरु चांडाल योग में ! आप अधिकारी बन जायेगे या कोई बड़े राजदूत बनेगे ! ये सब चौथी सीढ़ी पर निर्भर करता है।
इसके साथ एक बात और है कि धर्म कर्म, नेकी दान पुण्य सब मनुष्य के साथ रहते है। इनेक साथ जीवन जीना चाहिए। अभिमान, ईर्ष्या और पाखंड को खुद से दूर रखना चाहिए तभी जीवन सफल होता है।