रासायनिक फर्टीलाइजर पर हमारी खेती की निर्भरता ने, मिट्टी की उपजाउ-पन को बर्बाद कर दिया है। उसमें पौधों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व तो कम हो ही गए हैं, साथ ही मित्र-जीवाणुओं और माइक्रोन्यूट्रिएंट की भी भारी कमी हो गई है। इसलिए अब उपजाऊ मिट्टी और टिकाऊ खेती के लिए, जैविक विधियों पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है।

गाय के गोबर को पोषण का सर्वाधिक श्रेष्ठ विकल्प माना जाता हैं अगर हम इस गाय के गोबर को वर्मी कम्पोस्ट बना ले तो पौधों के लिए आवश्यक सभी सूक्ष्म तत्व संतुलित मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। इन सूक्ष्म तत्वों को पौधे या फसलें बड़ी आसानी से अवशोषित कर लेती हैं। गोबर में उपस्थित सूक्ष्मजीव मृदा में उपस्थित जैव-भार के विघटन का भी कार्य करते हैं इस विधि में खाद का निर्माण अपेक्षाकृत कम समय में हो जाता है।
इस विधि से प्राप्त खाद की गुणवत्ता भी अधिक होती है। वर्मी कम्पोस्ट विधि से प्राप्त खाद का भण्डारण भी ज्यादा सहजता से किया जा सकता है। इन सब कारणों से इस विधि के प्रति किसानों में स्वतः ही आकर्षण उत्पन्न हो रहा है।

प्राकृतिक ढंग से कचरों की सफाई कर, हमारे पौधों को लाभ पहुंचाने वाला केंचुआ,…रासायनिक खाद-फर्टीलाइजर और पेस्टीसाइड के अंधाधुंध इस्तेमाल के कारण, अब नेचुरली बहुत कम मिलता है। इसलिए इसे उपयुक्त वातावरण मुहैया कर पाला जाता है, और इससे प्राप्त वर्मी कंपोस्ट से, आप अपनी मिट्टी की सेहत और उसकी उर्वरता बढ़ा कर अच्छी उपज ले सकते हैं।
वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए, फ़सल अवशेष या गोबर इकट्ठा कर उसे अपघटित करते हैं, फिर 20-25 दिन बाद उसमें केंचुए डाले जाते हैं। जो उसे खाकर वर्मी कास्ट में बदलते हैं। लेकिन अब संवर्धित यानी ज्यादा अच्छी गुणवत्ता का वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए उसमें कुछ और तत्व भी मिलाए जाते हैं।

दरअसल वर्मी कंपोस्ट बनाने की कई विधियां हैं, टैंक विधि में केंचुओं को सर्फेश एरिया कम मिलता है, इसलिए ढेर विधि ज्यादा बेहतर मानी जाती है। साथ ही खुले में इसे बनाने से नुक़सान की आशंका रहती है, इसलिए एक ख़ासा ढांचा बेहतर होता है। जिनके पास ज्यादा संसाधन नहीं, वो बड़े छायादार पेड़ों के नीचे सतह को ऊंचा कर भी ढ़ेर विधि से वर्मी कंपोस्ट बना सकते हैं।

वर्मी कंपोस्ट के लिए गोबर के ढेर में पानी के छिड़काव से नमी बनाए रखें, जब 20-25 दिन में ये अपघटित हो जाए यानी सड़ने लगें, तो उसमें उंगली डाल कर तापमान चेक करें, जब ढेर में गर्मी ना हो, तब केंचुए डालें।
गोबर के ढेर में किसी तरह की खट्टी चीज़ ना जाए, साथ ही प्लास्टिक और शीशे के टुकड़े भी ना हो। केंचुओं को गोबर के ढ़ेर में मिलाने के 2-3 हफ्ते बाद, ढ़ेर में गोलदाना चायपत्ति जैसी संरचना दिखेगी, जिसे वर्मी कास्ट कहते हैं। अब ढ़ेर में नीचे जहां तक केंचुआ ना दिखे, ऊपर से वैसा वर्मी कास्ट निकाल लें। इसे छान कर वर्मी कंपोस्ट के रूप में उपयोग कर सकते हैं या इसे बेचकर आप मुनाफ़ा कमा सकते हैं।

दरअसल अब वर्मी कंपोस्ट भी फर्टीलाइज़र कंट्रोल ऑर्डर यानी उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत आ चुका है। इसलिए खुद के या आसपास में उपयोग के अलावा, अगर आप इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री करना चाहते हैं। तो प्रामाणित लैब में प्रोडक्ट की टेस्टिंग करवा कर सर्टिफिकेट लेना होता है।
वर्मी कंपोस्ट में सरकार की तरफ से तय मानक में तत्व होने चाहिए। इस तरह आप वर्मी कंपोस्ट बना कर खुद इस्तेमाल कर सकते हैं, या बेरोज़गार इसे बड़े पैमाने पर बना कर अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं। इससे पर्यावरण की रक्षा के साथ ही मिट्टी का स्वास्थ्य सुधार सकते हैं।