गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में चल रही साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कार देने की शुरुआत घर से होती है और माता-पिता का आचरण ही उनके लिए सबसे बड़ी पाठशाला है।
माता-पिता के आचरण से संस्कार सीखते हैं बच्चे
वृंदावन से पधारे कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने सीता वन गमन, लव-कुश जन्म और गजेंद्र मोक्ष सहित विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि बच्चा वही सीखता है, जो वह अपने सामने देखता है। इसलिए माता-पिता को बच्चों के सामने उत्तम चरित्र और आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संस्कारों की पाठशाला जन्म से नहीं, बल्कि गर्भ से प्रारंभ होती है। सनातनी पाठशाला सद्गृहस्थ के घरों में चलती है और बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
आत्मसुख देने वाला कर्म ही धर्म का मूल
कथा व्यास ने कहा कि संपूर्ण धर्म का मूल परमात्मा है। जिस कर्म को करने के बाद आत्मग्लानि के बजाय आत्मसुख की अनुभूति हो, वही धर्म का मूल है। वहीं ऐसा कर्म जिससे पश्चाताप हो और दूसरे को पीड़ा पहुंचे, अधर्म का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, दया और करुणा जैसे धर्मलक्षण सभी के लिए समान हैं। वास्तविक धर्म अपने आचरण से किसी को पीड़ा न पहुंचाने और प्राणी मात्र के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा देता है।

भक्ति और साधना का अहंकार भी भक्त के लिए बाधक
स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि भौतिक पद और प्रतिष्ठा का अहंकार तो नुकसानदायक है ही, लेकिन साधना और भक्ति का अहंकार भी भक्त के लिए बाधक बन जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में जो भी उपलब्धि है, वह भगवान की कृपा से प्राप्त हुई है। इसलिए मन में ‘मेरा कुछ नहीं है’ का भाव रखना चाहिए।
दंड व्यवस्था से समाज में बना रहता है अनुशासन
कथा व्यास ने कहा कि अपराधी को अपराध का दंड नहीं दिया जाए तो दूसरे लोगों में भी अपराध की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बिना भेदभाव और पक्षपात के अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की नीति पर काम कर रहे हैं।

33 करोड़ देवी-देवता समाधान, समस्या नहीं
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की विशेषता है कि एक की अनेक में और अनेक की एक में उपासना की जाती है। 33 करोड़ देवी-देवता उपासक के लिए समस्या नहीं, बल्कि समाधान हैं। सभी देवी-देवता परमात्मा के विभिन्न स्वरूप हैं और साधक अपनी रुचि के अनुसार किसी भी स्वरूप की भक्ति कर सकता है।
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र संकटों से मुक्ति का मार्ग
गज-ग्राह प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्त के साथ-साथ उसके भक्त का भी उद्धार करते हैं। उन्होंने गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के भावपूर्ण पाठ को भगवान की कृपा प्राप्त करने का माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति प्राणी मात्र के प्रति दया, क्षमा और करुणा का भाव रखता है, उससे भगवान प्रसन्न होते हैं। संतों का व्यवहार भी यही है कि वे स्वयं कष्ट सह लेते हैं, लेकिन दूसरों को कष्ट नहीं देते। कथा के अवसर पर योगी कमलनाथ जी महाराज, महंत शिवनाथ जी महाराज, डॉ. योगी महेंद्रनाथ जी महाराज, महंत रामबालक दास जी महाराज और महंत रविंद्रदास जी महाराज सहित संत-महात्मा मौजूद रहे। कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया।
अंकित श्रीवास्तव की रिपोर्ट