एक और जहां सरकार बच्चों को शिक्षित करने व शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं चला रही है वहीं दूसरी ओर आजादी के 73 साल बाद भी एक गांव ऐसा है, जहां आज भी कोई सरकारी स्कूल नहीं है।
जिससे गांव के ज्यादातर बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते है। यदि कुछेक अभिभावक अपने जिगर के टुकड़ों को दूसरे गांव में पढ़ने भेजते है तो उन्हें किसी न किसी अप्रिय घटना का भय बना रहता है और वे अपने बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा भी पूरी नही करवा पाते।
हम बात कर रहे हैं जनपद सहारनपुर के ब्लॉक साढौली कदीम के गांव घघरौली की। इस गांव की आबादी 1500 के करीब है। बावजूद इसके आज भी गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है। चुनाव के दौरान बड़े बड़े वादे करने वाले नेता भी जीतने के बाद ग्रामीणों की इस समस्या का समाधान नहीं कर पाए।
अब देखना है कि प्रदेश की भाजपा सरकार शिक्षा का ग्राफ बढ़ाने के लिए इस गांव में स्कूल बनवाने की पहल करती है या फिर अन्य सरकारों की तरह इस गांव के लोगो फिर से अगली सरकार की ओर आस लगाकर बैठना होगा।
वर्तमान परिवेश में अशिक्षित होने को बहुत बड़ा पाप समझा जाता है लेकिन क्या इस पाप का सारा दोष ऐसे बच्चों पर मढ़ दिया जाए जो अशिक्षित हैं, या फिर उसके पीछे छिपे उन कारणों को माना जाए जिससे बच्चे अशिक्षित रह गए।
केंद्र व राज्य सरकार द्वारा शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए वैसे तो तरह-तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन इसके इतर घघरौली गांव में छोटे-छोटे बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के लिए जूझ रहे हैं।
बड़े होकर देश व समाज की सेवा करने का जज़्बा मन मे रखने वाले मासूमो को सरकार या अफसरों की अनदेखी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है या फिर यूं कहा जाए देश का भविष्य का सपना उड़ान भरने से पहले ही टूट रहा है।
गांव में सरकारी स्कूल में होने के कारण छोटे-छोटे बच्चे या तो कई कई किलोमीटर दूर चल कर शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं या फिर बच्चों की समस्याओं को देखकर अभिभावक बच्चों को नहीं पढ़ा पा रहे हैं।
ग्राम प्रधान हाशिम सिद्दीक का कहना है कि वे कई बार प्रयास कर चुके है। उनके पास ग्राम समाज की जमीन नही है जिससे विभागीय अधिकारी पीछे हट जाते है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि अगर ग्राम समाज की जमीन नही होगी तो क्या गांव में स्कूल नही बन पायेगा ? क्या देश का भविष्य यू ही सड़को और गलियों में घूमेगा ?