{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
कहते है कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई ज़रूरत नहीं होती है। अगर आप मोबाइल पर बात कर रहे है और सामने से कोई गाड़ी आपको आकर चोट पहुंचा देती है तो इसमें उसकी क्या गलती है ? अगर आप कॉल पर बात करने की बजाय उसका हॉर्न सुनते तो शायद आपको चोट नहीं लगती। इसका सीधा सा मतलब यह है कि आप एकाग्रचित नहीं है।
इसके अलावा आपका ध्यान अपने काम पर ना होकर कहीं और था। आप सड़क पर चल रहे है तो आपका ध्यान उस पर चल रहे वाहनों पर होना चाहिए लेकिन आपका ध्यान कहीं और था। यही एकाग्रता की कमी हमेशा इंसान से गलती करवाती है।
यहां समझाने का मतलब यह है कि जीवन में कई बार काम इसलिए भी बिगड़ जाते है क्योंकि इंसान एकाग्र नहीं होता है। अगर आपको जीवन में सफल होना है तो आपको अपने मन और चित्त को एकाग्र करना होगा।
रावण ने माता सीता का हरण कर लिया और बाद में राम जी ने सुग्रीव से मैत्री की और हनुमान जी ने सीता माँ का पता लगाया। रावण से युद्ध करना जरुरी था और उस समय में श्री राम ने धीरज नहीं खोया और ना ही अपने मन को कहीं और लगाया।
उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था अपनी पत्नी को किसी भी प्रकार इस रावण की कैद से आजाद करवाना। इसके लिए उन्होंने एकाग्रचित होकर कर्म किया और आखिरकार में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।
इसी प्रकार आप भी जब कोई काम कर रहे है तो सिर्फ निगाह अपने लक्ष्य पर रखिए, इसका सबसे अधिक फायदा आपको ही होना है क्योंकि ऐसा करने से यह निश्चित है की आपको सफलता मिलनी ही मिलनी है।
इसका एक उदाहरण महाभारत में मिलता है। जब द्रोणाचार्य कौरव और पांडवों को शिक्षा दे रहे थे तब उन्होंने एक बार सबकी परीक्षा करनी चाही। उन्होंने पेड़ पर चिड़िया का पुतला रख दिया और बारी बारी से सबको पुकारा।
वो हर बार यही प्रश्न करते कि आपको क्या दिख रहा है ? कोई कहता मुझे जंगल दिखाई दे रहा है ! कोई कहता मुझे पेड़ दिखाई दे रहा है ! कोई कहता मुझे तो पक्षियों का झुण्ड दिखाई दे रहा है लेकिन जब अर्जुन से प्रश्न किया गया तो उसने कहा कि मुझे तो बस चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है।
इसी में आपके श्रेष्ठ बनने का राज़ छिपा है। जिस दिन आपको सिर्फ अपना लक्ष्य दिखाई देगा और आप एकाग्र हो गए उसी दिन आप यह जान लीजिये की आप सफल हो गए। यही जीवन का गणित है और यही वो राज़ है जिससे आप महान बन जाते है।