परिवर्तन प्रकृति का नियम है और अगर इस नियम को तोड़ने में किसी राष्ट्र का मुखिया ही सबसे आगे हो, आप क्या कहेंगे? निश्चित रूप से आप कहेंगे ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन वर्तमान में ऐसा कई देशों में हो रहा है। आज बात विश्व बिरादरी की और जिक्र होगा उस पश्चिमी यूरोप का। जहां बदलाव की बयार इन दिनों सड़कों पर है विरोध की चिंगारी तो पूछिये ही मत,क्योंकि ये चिंगारी ना केवल तानाशाही हुक्मरां के खिलाफ है, बल्कि ये चिंगारी उस आवाम के लिए भी है जो अब पश्चिमी यूरोप में परिवर्तन चाहती है, अभिव्यक्ति की आजादी चाहती है,बदलाव चाहती है। बात कर रहे हैं बेलारूस की। जहां राजधानी मिंस्क से लेकर शहरों की सड़कों पर सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों की आवाज काफी बुलंद हो रही है। वो भी तब जब इस देश में हुक्मरां के खिलाफ बोलना तक जुर्म है, ना केवल जुर्म है बल्कि इसके लिए बा-मशक्कत जेल की सजा भी मुकर्रर की जाती है। इन हालातों में भी ये विरोधी बयार पूरे बेलारूस में हिलोरें मार रही है। इस विरोध की वजह हैं यहां के राष्ट्रपति एलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको। उन पर आरोप हैं कि वो करीब 26 सालों से लगातार राष्ट्रपति का पद ना केवल कूटरचित मानकों के बल पर सम्हाल रहे हैं बल्कि आरोप तो यहां तक हैं कि वो चुनावों में धोखाधड़ी करने में भी माहिर हैं और जब चाहे तब देश के कानून में संशोधन करते रहते हैं। खैर, अब जान लेते हैं आखिर बेलारूस में प्रदर्शन की वजह क्या है और राष्ट्रपति एलक्जेंडर लुकाशेंको को सत्ता से हटाने की कोशिश क्यों हो रही हैं? तो जान लीजिये कि जुलाई 1994 से आज तक लुकाशेंको देश के राष्ट्रपति बने हुए हैं। अब आप सोचेंगे कि इसमें हर्ज ही क्या है अच्छी बात है, कोई तो बात होगी शख्स में तभी वो हर बार जनता के प्रेम का अधिकारी बनता है और हर बार जनता उसे वो ताज पहनाती है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल 1992 में सोवियत संघ के खत्म हो जाने के बाद लुकाशेंको ने बेलारूस की बागडोर संभाल ली थी। सोवियत संघ खत्म जरूर हुआ लेकिन लुकाशेंको ने उसके दिए नाम की खुफिया सर्विस KGB रखी और उसका नाम भी वही रहने दिया। कोई बात नहीं। लेकिन इस बीच ऐसा क्या हुआ कि लोग अब उसे तानाशाह के नाम से अभिहित करने लगे। इसके पीछे की वजह भी जानिये। ऐसा कहा जाता है कि अलेक्जेंडर लुकाशेंको यूरोप के आखिरी तानाशाह हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वो सत्ता में रहने के लिए संवैधानिक संशोधन और कानूनों में बदलाव करते रहे हैं। यही नहीं अगर आप उस देश के नागरिक हैं तो आपको उनकी बेइज्जती करने या फिर उनके बारे में बुरा कहने का,उनके खिलाफ आवाज उठाने का कोई हक नहीं है। अगर आप ऐसा करते हैं इस देश में आपको पांच साल तक की कैद की सजा हो सकती है। यही नहीं बेलारूस की आलोचना करने पर दो साल तक जेल हो भी हो सकती है। तो है ना ये लोकतंत्र की खिलाफत। त्रस्त जनता की हकीकत। खैर और जान लीजिये कि बेलारूस में अब तक 6 राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं लेकिन इनमें से एक भी चुनाव को निष्पक्ष और तटस्थ नहीं माना जा रहा है। आरोप लगते रहे हैं लुकाशेंकों ने एक ऐसी संसद बना रखी है, जो केवल उनके इशारों पर काम करती है, ये एक ऐसी संसद है जिसमें विपक्ष को तो भूल जाइये। यहां तक कि न्यूज चैनल सरकारी भोंपू बन गए हैं। चाहे जनता में बेरोजगारी फैली हो, चाहे भ्रष्टाचार चरम पर हो, लोगों की आय की तो पूछिये ही मत। तमाम दिक्कते हैं,उलझनें हैं,शिकवे-शिकायतें हैं। लेकिन मज़ाल है कि कोई राष्ट्रपति एलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको के खिलाफ आवाज उठा दे। लेकिन अब माहौल बदला है। आवाजें उठ रही हैं, और विपक्ष मजबूत बनकर उभरने की कोशिश कर रहा है। इसी का नतीजा है कि अब मुद्दे विद्रोह बनकर धीरे-धीरे सुलग रहे हैं और बदलाव की दरकार कर रहे हैं।