रिपोर्ट- पल्लवी त्रिपाठी
उत्तराखण्ड : उत्तराखण्ड की केदारघाटी में कई रहस्य आज भी छिपे हुए हैं, जिन्हें विश्वस्तरीय पहचान नहीं मिल सकी है । ऐसी ही एक जगह उत्तराखंड में सामने आयी हैं । जहां भगवान जाखदेवता दहकते अंगारों पर नृत्य करते है । इस दृश्य के हजारों लोग गवाह बनते है । यह धार्मिक अनुष्ठान जाखधार में हर वर्ष बैसाखी के दूसरे दिन किया जाता है ।
मान्यता है कि यहां का स्थानीय चरवाहा भेड़-बकरियों को चराने जंगल गया था । जहां उसे एक अलग सा पत्थर का टुकड़ा दिखाई दिया । चरवाहे ने पत्थर को अपनी घास की कण्डी में रख लिया और सोचा कि भेड़ो के ऊन को साफ करने के काम आएगा । हालांकि, घर वापस आते-आते वह पत्थर भारी हो गया और कण्डी पर लगी डोरी टूट गई । जिसके बाद पत्थर जाखधार में ही स्थापित हो गया । बताया जाता है कि बाद में चरवाहे के सपने में भगवान जाखराज ने दर्शन दिए और वहां पर विराजमान होने की बात कहीं ।
जाखदेवता को यक्षराज यानी वर्षा का देवता कहा जाता है । कोई इन्हें शिव स्वरुप मानता है जबकि कोई उन्हें विष्णु स्वरुप मानता है । वहीं, स्थानीय पुजारी का कहना हैं कि जब भगवान यक्षराज दहकते हुए अंगारों में नृत्य करते हैं तो वह नारायण स्वरुप रहते हैं अन्यथा वह शिव स्वरुप हैं ।
बैशाखी के दिन से ही पूरी परंपराओं और विधान के अनुसार जंगल से भारी लकड़ियां इक्कठा की जाती हैं और उनको प्रज्वलित किया जाता है । जिसके बाद भगवान नर के रूप में अर्धनग्न होकर इस कुण्ड में प्रवेश करते हैं और दहकते हुए अंगारों पर नृत्य करते हैं । इस आयोजन को लेकर वहां के स्थानीय लोगों में काफी उत्साह रहता है और दूर-दूर से लोग भगवान के इस स्वरुप को देखने के लिए वहां पहुंचते हैं । बाद में उसी अग्नि कुण्ड की राख को प्रसाद के रुप में अपने घरों को ले जाते हैं ।