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दुदबोली अमावस्या पर आदिवासी अंचलों में अनोखी परंपरा

बुरहानपुर के आदिवासी अंचलों में दुदबोली अमावस्या का पर्व पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रामीणों ने अच्छी बारिश और समृद्ध फसल की कामना करते हुए इंद्र देव की पूजा-अर्चना की। बच्चों ने पारंपरिक रीति से गांव में घूमकर नेग मांगा और सामूहिक गीत-संगीत व नृत्य से माहौल को जीवंत बनाया। यह पर्व आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामूहिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

By: Nivedita 
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दुदबोली अमावस्या पर आदिवासी अंचलों में अनोखी परंपरा

बुरहानपुर जिले के आदिवासी क्षेत्रों में दुदबोली अमावस्या का पर्व इस बार पारंपरिक उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आदिवासी समाज के लोग बारिश के देवता इंद्रदेव से अच्छी वर्षा और बेहतर फसल की कामना करते हैं। इस पर्व को स्थानीय रूप से “भावई” और “ठूडी” के नाम से भी जाना जाता है।

मानसून से पहले होती है खेती की तैयारी

मान्यता के अनुसार यह पर्व मानसून आने से लगभग 8 से 10 दिन पहले मनाया जाता है। इसके बाद किसान खरीफ फसलों जैसे मक्का और धान की बुवाई की तैयारी शुरू कर देते हैं। यह पर्व कृषि जीवन और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

बच्चों की अनोखी परंपरागत भूमिका

पर्व के दौरान गांवों में बच्चों ने पारंपरिक गीतों और सामूहिक नृत्य के माध्यम से उत्सव को जीवंत बना दिया। एक विशेष परंपरा के तहत एक बच्चे को हरे पत्तों से ढककर सजाया जाता है, जबकि अन्य बच्चे टोकरी में मेढ़क रखकर गांव में घूमते हैं और लोगों से पारंपरिक नेग मांगते हैं। इस दौरान नेग के रूप में केवल कच्चा अनाज स्वीकार किया जाता है।

सामूहिक भोजन और प्रकृति पूजा

गांव के बाहर जामुन या आम के पेड़ के नीचे सभी बच्चे सामूहिक रूप से भोजन तैयार करते हैं और उसे प्रसादी के रूप में ग्रहण करते हैं। इस दौरान इंद्रदेव से अच्छी बारिश, हरियाली और समृद्ध फसल की प्रार्थना की जाती है।

प्रकृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण

दुदबोली अमावस्या आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामूहिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व आज भी ग्रामीण अंचलों में परंपराओं को जीवित रखते हुए सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करता है।

 

 

 

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