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मर्दों के दाढ़ी और बाल बनाकर बच्चों का पेट पालती है यह महिला, घर-घर जाकर करती है ये काम

फैशन के इस दौर में बड़े-बड़े ब्यूटी पार्लर में महिला हेयर स्टाइलिश को पुरुषों के बाल काटते और शेव करते आपने कई बार देखा होगा। लेकिन यही काम को जब किसी गांव की कोई महिला घर-घर जाकर करें ऐसी खबर आपने तो नहीं सुनी होगी

By: RNI Hindi Desk 
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मर्दों के दाढ़ी और बाल बनाकर बच्चों का पेट पालती है यह महिला, घर-घर जाकर करती है ये काम

रिपोर्ट: सत्यम दुबे

नई दिल्ली: फैशन के इस दौर में बड़े-बड़े ब्यूटी पार्लर में महिला हेयर स्टाइलिश को पुरुषों के बाल काटते और शेव करते आपने कई बार देखा होगा। लेकिन यही काम को जब किसी गांव की कोई महिला घर-घर जाकर करें ऐसी खबर आपने तो नहीं सुनी होगी। गावों में ऐसा काम करना काफी कठिन हो जाता है। इसके बाद भी तमाम बाधाओं को पार कर  सामाजिक तानों को दरकिनार कर बिहार के सीतामढ़ी में एक महिला अपनी गरीबी को दूर करने के लिए पुरुषों के बाल और दाढ़ी बनाती है।

स्वावलंबी महिला अपने इस काम से कमाई कर घर का खर्च चलाने के साथ बूढ़ी मां और अपने बच्चों की देखभाल कर रही है। आपको बता दें कि बाजपट्टी इलाके की बररी फुलवरिया पंचायत के बसौल गांव निवासी 35 साल की सुखचैन देवी की शादी 16 साल पहले पटदौरा गांव में हुई। ससुराल में कोई जमीन नहीं होने और पिता की मौत के बाद दो बेटों और एक बेटी के साथ मां की जिम्मेदारी भी उनके सिर आ गई। पति रमेश चंडीगढ़ में बिजली मिस्त्री का काम करते हैं, जिससे परिवार का गुजारा मुश्किल है। इसके बाद सुखचैन देवी  ने  दो साल पहले अपने पुश्तैनी काम को करने की ठानी।

आपको बता दें कि जितना आसान सुखचैन देवी के काम को बताना है, उनके लिए ये काम इतना आसान था नहीं।  शुरुआत में लोग बाल-दाढ़ी बनवाने से हिचकते थे, लेकिन वह मायके में ही रहती हैं, इसलिए उन्हें बेटी और बहन कहने वाले उनसे काम करवाने लगे। अब ना ग्रामीणों और ना ही सुखचैन देवी में इस काम को लेकर कोई झिझक है।

सुखचैना देवी अब सुबह कंघा, कैंची, उस्तरा लेकर गांव में निकल जाती हैं। घूम-घूमकर लोगों की बाल और दाढ़ी बनाती हैं। बुलावे पर घर भी जाती हैं। इससे प्रतिदिन करीब 200 रुपये कमा लेती हैं। इससे घर चलाने में काफी सहायता मिलती है।

सुखचैन देवी नाई परिवार जन्मीं, लेकिन कभी उन्होने इस काम को सीखा नहीं। मां-बाप की एकलौती संतान होने के चलते बचपन में उनके पिता जहां भी दाढ़ी-बाल बनाते जाते थे, साथ ले जाते थे। उन्हें देखते-देखते यह काम सीख लिया। बड़ी होने पर मायके में बच्चों के बाल काटने से शुरुआत की। शादी के बाद इससे नाता टूट गया। लेकिन तीन बच्चों पढ़ाने और गरीबी में परिवार की मदद के लिए इसकी फिर से शुरुआत की।

सुखचैन का कहना है कि पहले पास-पड़ोस में लोगों के यहां शादी-ब्याह के मौके पर महिलाओं के बाल और नाखून काटने से लेकर दूसरे काम करती थीं। धीरे-धीरे पुरुषों की हजामत करने लगी। ट्रेनिंग का मौका और साधन मिले तो ब्यूटी पार्लर खोल लूंगी। वह कहती हैं कि तीनों बच्चे अच्छी तरह से पढ़-लिख सकें, यही कोशिश है।

 

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