{ स्वतंत्र पत्रकार प्रणव गोस्वामी की कलम से }
नेपाल की वामपंथी सरकार पूरी तरह से चीन के पक्ष में झुकती हुई नज़र आ रही है। सबसे पहले तो उसने भारत के इलाकों के अपने नक़्शे में दिखाया। इसके बाद भारत की बेटियों को 7 साल तक नागरिकता ना मिलने की साजिश की।
अब इससे भी नेपाल का पेट नहीं भरा तो उसने सदियों से चले आ रहे रिश्तों को दांव पर लगा दिया है। अब नेपाल के पीएम ओली ने हिंदी को बैन करने की तैयारी कर ली है।

हालांकि उनके इस कदम का विरोध होने लगा है। क्यूंकि नेपाल ने नेपाली के बाद सबसे अधिक हिंदी ही बोली जाती है। नेपाल एक तरफ भारत का दुश्मन बन रहा है वहीं चीन नेपाल के गांवो में घुस रहा है।
चीन के अतिक्रमण पर नेपाल सरकार घिरी हुई है लेकिन अपने इलाकों को चीन से आज़ाद करवाने की बजाय उनका ध्यान भारत पर ज्यादा है।
दूसरी और नेपाल की सत्ताधारी कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने पीएम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने पीएम को समर्थन देकर गलती की है।