मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति में परंपरा और विज्ञान कभी अलग-अलग नहीं रहे हैं। सनातन व्यवस्था के संस्कार केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, स्वस्थ और मूल्यवान बनाने की वैज्ञानिक पद्धति हैं। उन्होंने बताया कि गर्भ में पल रहे शिशु को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से संस्कारित करने की प्रक्रिया को गर्भ संस्कार कहा जाता है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि प्रदेश में बनने वाले शासकीय चिकित्सालयों के भवनों में गर्भ संस्कार कक्ष बनाए जाएंगे तथा चिकित्सा विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध महाविद्यालयों में गर्भ संस्कार के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए शीघ्र ही गजट नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव रविवार को डेली कॉलेज में आयोजित गर्भ संस्कार पुस्तक विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। मुख्यमंत्री का अंगवस्त्रम और श्रीफल भेंट कर स्वागत किया गया। इस अवसर पर उन्होंने पुस्तक “गर्भ संस्कार” का विमोचन किया, जिसके लेखक डॉ. अनिल गर्ग और डॉ. सीमा गर्ग हैं। मुख्यमंत्री ने उपस्थित जनसमुदाय को गर्भ संस्कार के प्रचार-प्रसार के लिए सकारात्मक प्रयास करने का संकल्प भी दिलाया तथा पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास का सम्मान किया।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि गर्भ शरीर निर्माण के साथ संस्कार की पहली पाठशाला भी है। आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध किया है कि गर्भावस्था के 5-6 माह से ही शिशु पर माँ की भावनाओं और बाह्य वातावरण का प्रभाव पड़ने लगता है। उन्होंने महाभारत में अभिमन्यु के प्रसंग सहित पौराणिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे पूर्वज मानसिक और भावनात्मक विकास की गहरी समझ रखते थे। आयुर्वेद की सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कोविड काल में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु आयुर्वेदिक प्रक्रियाओं को व्यापक रूप से अपनाया गया। आयुर्वेद में गर्भ संस्कार के महत्व को स्वीकार किया गया है और वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इसके महत्व को मान्यता दे रहा है।
अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि भारत का चिंतन विश्व को संचालित करने का नहीं, बल्कि मार्गदर्शन करने का है। भारत एक “सुपर राष्ट्र” के रूप में जीवन के विविध क्षेत्रों में दुनिया को सही दिशा दिखाएगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का उत्थान केवल शिक्षा या भौतिक संपदा से नहीं, बल्कि सुशिक्षा और सुसंस्कार से संभव है। पश्चिमी दृष्टि जहाँ मनुष्य को मशीन मानती है, वहीं भारतीय चिंतन पूर्ण विकसित मनुष्य के निर्माण पर केंद्रित है। शक्ति के साथ संस्कार अनिवार्य हैं, तभी समाज और राष्ट्र सुरक्षित व समृद्ध बनते हैं।

जोशी ने युवाओं और दंपत्तियों से आग्रह किया कि शास्त्रों में निहित मूल्यों को केवल प्रस्तुति तक सीमित न रखें, बल्कि आचरण में उतारें। इसके लिए जनजागरण और व्यापक आंदोलन की आवश्यकता है, ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी व्यक्ति सही मार्ग पर चल सके और राष्ट्र निर्माण में सहभागी बने।
कार्यक्रम को डॉ. अनिल कुमार गर्ग और डॉ. हितेश भाई जानी ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, विधायक महेन्द्र हार्डिया और गोलू शुक्ला सहित अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।