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Labour Law: भारत श्रमिकों के कानून और मौलिक अधिकार के बारे में आइये जानते हैं…

भारत में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा एवं श्रम संबंधों को व्यवस्थित करने के लिए अनेक श्रम कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्यदशा, उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा तथा औद्योगिक विवादों का शांतिपूर्वक समाधान सुनिश्चित करना है।

By: Abhinav Tiwari 
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Labour Law: भारत श्रमिकों के कानून और मौलिक अधिकार के बारे में आइये जानते हैं…

भारत में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा एवं श्रम संबंधों को व्यवस्थित करने के लिए अनेक श्रम कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्यदशा, उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा तथा औद्योगिक विवादों का शांतिपूर्वक समाधान सुनिश्चित करना है। श्रमिक कल्याण, कार्य-सुरक्षा, वेतन एवं काम के घंटे इत्यादि विषयों को नियंत्रित करने वाले प्रमुख अधिनियम श्रम व्यवस्था को सुदृढ़ करते हैं।

उदाहरण के लिए, कारखाना अधिनियम (1948) सुरक्षित कार्यशाला सुनिश्चित करता है, वेतन भुगतान अधिनियम (1936) समय पर मजदूरी देने का प्रावधान रखता है, और औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) श्रमिक-नियोक्ता विवाद निपटाने की मशीनरी प्रदान करता है। इन कानूनों से श्रमिकों को अपने अधिकारों के प्रति सुरक्षा मिलती है तथा उद्योगों में सामाजिक न्याय और शांति बनी रहती है।

प्रमुख श्रम कानून

भारतीय श्रम व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण अधिनियम हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं:

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947: इस अधिनियम का उद्देश्य नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों का न्यायसंगत और शांतिपूर्ण निपटान सुनिश्चित करना है। इसमें हड़ताल, तालाबंदी और छंटनी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए अदालतों, मध्यस्थता बोर्ड व अन्य उपायों का प्रावधान है।

कारखाना अधिनियम, 1948: यह अधिनियम कारखानों में कार्य की दशाओं, मशीनरी की सुरक्षा, श्रम स्वास्थ्य, कार्य समय, विश्राम अवकाश, कैंटीन, क्रेच आदि का नियमन करता है। इसमें प्रत्येक पांच घंटे काम के बाद अवकाश, प्रति सप्ताह एक अवकाश, तथा कारखानों में सुरक्षित कार्य वातावरण बनाए रखने के उपाय शामिल हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद इसमें सुरक्षा मानदंड और सुविधाओं को और मजबूती मिली है।

श्रम कल्याण कोष अधिनियम: कुछ राज्यों ने श्रमिक कल्याण के लिए भत्ते/कोष अधिनियम बनाए हैं। इन अधिनियमों के तहत नियोक्ता और श्रमिक द्वारा योगदान से एक कल्याण कोष गठित किया जाता है, जिसे श्रमिकों की स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए प्रयोग किया जाता है। (उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री श्रम कल्याण कोष आदि।)

वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 एवं न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948: ये कानून मजदूरी के समय पर भुगतान और न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करते हैं। वेतन भुगतान अधिनियम के तहत सभी श्रमिकों को निर्धारित समयावधि में पूर्ण मजदूरी मिलनी चाहिए। न्यूनतम वेतन अधिनियम श्रमजीवी को जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम वेतन देने की गारंटी करता है।

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961: यह अधिनियम गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पूर्व तथा पश्चात् अवकाश और अन्य लाभ (चिकित्सा जाँच, प्रसूति भत्ता आदि) प्रदान करता है। यह 10 या अधिक कर्मचारियों वाली सभी संस्थाओं पर लागू होता है। संशोधन के बाद 2 से कम बच्चों वाली महिलाओं को 26 सप्ताह तक, और दो या अधिक बच्चों वाली महिलाओं को 12 सप्ताह तक वेतन सहित मातृत्व अवकाश मिलता है।

बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986: इस अधिनियम (2016 में संशोधित) के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी खतरनाक काम या व्यवसाय में पूर्णतया रोजगार पर प्रतिबंध है। इससे कम उम्र के बच्चों को बचपन में शिक्षा और सामान्य विकास का मौका मिलता है। किशोर (14-18 वर्ष) श्रमिकों के लिए अलग नियम हैं, जिनमें कार्य समय और परिस्थितियों के संबंध में नियंत्रण है।

इन कानूनों के अतिरिक्त कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (1948), कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम (1952) आदि भी श्रमिक सुरक्षा एवं कल्याण से संबंधित हैं। कुल मिलाकर ये अधिनियम श्रमिकों के अधिकारों को संरक्षित करके कार्यस्थल पर न्यायसंगत स्थिति सुनिश्चित करते हैं।

श्रमिकों के मौलिक अधिकार

संविधान ने श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कई मौलिक अधिकार और निर्देशक तत्त्व दिए हैं। अनुच्छेद 23 दासप्रथा निषेध करता है, अनुच्छेद 24 14 वर्ष से कम आयु के बालकों का श्रम निषेध करता है, तथा अनुच्छेद 39(e)–(f) काम की सम्मानजनक दशा, स्वास्थ्य एवं न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करता है।

अनुच्छेद 42 में न्यायसंगत एवं मानवीय कार्यदशा और मातृत्व राहत अनिवार्य की गई है। इन प्रावधानों के माध्यम से संविधान श्रमिकों को बिना शोषण के काम करने, सुरक्षित माहौल की माँग करने और समान काम का समान वेतन पाने का संवैधानिक अधिकार देता है।

कार्य समय और ओवरटाइम नियम

वयस्क श्रमिकों के कार्य समय पर कारखाना अधिनियम (1948) में प्रावधान हैं। दैनिक कार्य समय अधिकतम 9 घंटे और साप्ताहिक अधिकतम 48 घंटे है। प्रत्येक पांच घंटे काम के बाद कम से कम आधा घंटा विश्राम अनिवार्य है। निर्धारित समय से अधिक काम पर ओवरटाइम प्रदान करना होता है; ओवरटाइम वेतन सामान्य मजदूरी का दो गुणा होता है।

दुकान एवं कार्यालय अधिनियमों में भी समान सीमा लागू होती है (अधिकांश राज्यों में दैनिक 8–10 घंटा, साप्ताहिक 48–54 घंटा)। कार्यसमय की इन सीमाओं के उल्लंघन पर दंड (जुर्माना/कैद) की व्यवस्था है।

साप्ताहिक अवकाश, वार्षिक अवकाश और अन्य छुट्टियाँ

साप्ताहिक अवकाश: प्रति सप्ताह कम से कम एक दिन (आमतौर पर रविवार) की छुट्टी लेना श्रमिक का अधिकार है। यह दिन कभी भी अन्य दिन से बदला जा सकता है बशर्ते पहले से सूचना हो।

वार्षिक अवकाश: कारखाना अधिनियम के अनुसार यदि कोई श्रमिक किसी वर्ष में 240 दिन या अधिक कार्य करता है तो अगले वर्ष उसे वेतन सहित अवकाश मिलता है। इसे पिछले वर्ष में काम किए गए 20 दिनों पर 1 दिन की दर से गणना करते हुए लगभग 18 दिन तक वार्षिक छुट्टी मिलती है। (बाल श्रमिकों के लिए यह अनुपात 15:1 है।) अवकाश के अवशेष को अगले वर्ष में स्थानांतरित किया जा सकता है।

अन्य छुट्टियाँ: फेस्टिवल, सार्वजनिक अवकाश एवं विशेष परिस्थितियों के लिए छुट्टियाँ भी श्रमिकों को मिलती हैं। उदाहरण स्वरूप मातृत्व अवकाश (उपरोक्त अधिनियम के तहत), बीमार दिवस आदि। इन छुट्टियों के माध्यम से श्रमिकों को व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का अवसर मिलता है।

महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षा और अधिकार

महिला श्रमिकों के लिए विशेष सुरक्षा उपाय लागू हैं। कारखाना अधिनियम (1948) के तहत महिलाओं को रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक कारखाना कार्य करने की अनुमति नहीं है। इसी अधिनियम की धारा 19 के तहत महिलाओं के लिए अलग शौचालय और वॉशिंग सुविधाएँ अनिवार्य की गई हैं।

हाल के कार्यस्थलों पर महिलाओं के प्रति उत्पीड़न से बचाने के लिए “कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निवारण व प्रतिषेध) अधिनियम, 2013” बनाया गया है, जिसके तहत प्रत्येक बड़े संगठन में शिकायत निवारण समिति का गठन करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, परिवहन सुविधाएँ और गर्भवती महिला के बैठने की व्यवस्था जैसे नियम भी लागू हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित वातावरण और समान अवसर प्रदान करना है।

कॉन्ट्रैक्ट वर्कर और अस्थायी श्रमिकों के अधिकार

ठेका श्रमिक (Contract Worker) अधिनियम, 1970 के तहत ठेका पर काम करने वाले श्रमिकों को समान काम के लिए समान सुविधाएँ और मजदूरी का अधिकार है। अधिनियम की धारा 25(5) के अनुसार यदि ठेका श्रमिक नियमित कर्मचारी के बराबर कार्य करता है तो उसका वेतन, अवकाश एवं सेवा शर्तें भी प्रधान नियोक्ता के कर्मचारी के समान होंगी। नियोक्ता ठेका कामगार से श्रम विभाग का लाइसेंस प्राप्त करके ही अनुबंध कर सकता है।

इस अधिनियम द्वारा ठेका श्रमिकों को पीने योग्य पानी, स्वच्छ आश्रय, प्राथमिक चिकित्सा, न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान जैसी मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी समान काम के लिए समान वेतन के अधिकार को मान्यता दी है। अस्थायी और अनुबंधित श्रमिकों को भी भेदभावरहित व्यवहार एवं कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

संगठित और असंगठित क्षेत्र में अंतर

संगठित क्षेत्र: इसमें औद्योगिक प्रतिष्ठान, कॉर्पोरेट कार्यालय आदि शामिल हैं जहाँ श्रमिकों को स्थायी रोजगार, नियमित मासिक वेतन एवं सामाजिक सुरक्षा (जैसे PF, ESI) मिलती है। इन संस्थानों में काम के घंटे, छुट्टियाँ और सुरक्षा प्रावधान स्पष्ट रूप से लागू होते हैं।

असंगठित क्षेत्र: इसमें दैनिक मजदूरी, घर-घर काम, कृषि मजदूरी इत्यादि कार्य आते हैं जहाँ श्रमिकों की जागीर अस्थायी होती है। यहाँ उन्हें न्यूनतम सुरक्षा और सुविधाएँ नहीं मिलती, अक्सर ओवरटाइम या लाभ का लाभ नहीं मिलता। असंगठित क्षेत्र में कामगारों की सामाजिक सुरक्षा बहुत सीमित होती है।

इन भिन्नताओं के कारण हाल में पारित श्रम संहिताओं में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को व्यापक सुरक्षा देने का प्रावधान किया गया है। ऐसा करने से उन्हें न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान और सामाजिक सुरक्षा का लाभ पहुंचाने का प्रयास हो रहा है।

श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ

श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए कई सरकारी योजनाएँ हैं:

कर्मचारी राज्य बीमा (ESI): यह अधिनियम नियोजित उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा, चिकित्सा सुविधा, तथा बीमारी, प्रसूति या दुर्घटना के समय नकद लाभ प्रदान करता है। नियोक्ता और कर्मचारी इसमें न्यूनतम योगदान देते हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) एवं पेंशन: कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर आर्थिक सहायता देने के लिए 1952 का ईपीएफ अधिनियम है। इसके तहत कर्मचारी तथा नियोक्ता प्रत्येक मासिक वेतन का एक निर्धारित भाग (लगभग 12%) भविष्य निधि कोष में जमा करते हैं, जिससे रिटायरमेंट पर एकमुश्त भुगतान या पेंशन मिलती है।

अन्य योजनाएँ: राष्ट्रीय और राज्य सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, दुर्घटना बीमा, कौशल विकास स्कीम, गरीब कल्याण योजनाएँ आदि के तहत भी श्रमिकों को सहायता देती हैं। उदाहरणतः श्रम कल्याण कोष, किसान श्रम योजना इत्यादि। इन योजनाओं में व्यापक रूप से श्रमिकों के स्वास्थ्य, ऋण सहायता, आवास आदि के लाभ शामिल हैं।

हालिया श्रम कोड्स में बदलाव (2020 के चार श्रम कोड)

सितंबर 2020 में संसद ने चार बड़े श्रम कोड पारित किए: मजदूरी संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; और सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020। इन संहिताओं ने पुराने कई कानूनों (जैसे कारखाना अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ESI, PF आदि) का समेकन कर दिया है।

इन कोडों के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी, समय पर भुगतान, सामाजिक सुरक्षा एवं व्यावसायिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को मजबूत किया गया है। सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत असंगठित, गिग तथा प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों सहित सभी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इन कोडों का उद्देश्य श्रम कानूनों को समावेशी और सरल बनाकर कामकाजी वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

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