{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }
हमारा पूरा भारत न्याय, धर्म और नीति पर चला है। इस पृथ्वी पर हर बार सभ्यता का जन्म लेती है और हर युगों में ईश्वर के हिसाब से वो चलती है। इस पृथ्वी पर चारों युग अपना अपना समय पूरा करते है और अपने गुणों को प्रदर्शित करते है।
सतयुग और त्रेता युग में भगवान् ने समय समय पर अवतार लिया है। हम सब जानते है की कैसे श्री राम ने अपने पिता की आज्ञा से वनवास भोगा और असुर रावण से अपनी पत्नी सीता को आजाद करवाकर उसका वध किया।
जिस असुर रावण देवताओं तक को बंदी बना लिया था, जिसके बेटे ने इंद्र तक को जीत लिया था उसी रावण का श्री राम ने वध कर दिया। इसके बाद यह भी पुराणों में वर्णित है की कैसे श्री कृष्ण ने द्वापर में अपने अत्याचारी कंस मामा को मारा।
कंस ने उनके माता और पिता को बंदी बना लिया था। द्वापर में कंस जैसा भाई था जिसने अपनी बहन को ही कैद कर लिया था और उस पर अत्याचार किए। द्वापर आते आते धर्म की शक्ति कम हो जाती है।
भरी सभा में द्रोपदी का अपमान कौरवों ने किया और उसकी साड़ी उतारने की कोशिश की और बाद में कौरवों का समूल विनाश हुआ। इसके बाद आता है कलियुग जिसमें कहते है की धर्म का सिर्फ एक ही पैर रह जाता है।
इस युग में सिर्फ झूठ बोलना, चोरी करना, अपना काम निकालना, ईर्ष्या जैसे अवगुण लोगों में अधिक पाए जाते है। हर जगह लोग एक दूसरे को ठग कर धन एकत्र करते है और सांसारिक भोगों में लिप्त रहते है।
यह एक ऐसा युग है जिसमें ईश्वर का भक्त बन जाना बड़ा कठिन है क्यूंकि इस युग में पाखंड सबसे आगे रहता है। धर्म को समझने और जानने वाले का कोई सम्मान नहीं किया जाता है।
इस युग में लोग शराब, जुए और भौतिक सुखों में ही लिप्त रहते है और पाखंडियो की संगत करते है। इसलिए इस युग में अपने मन को पवित्र रखकर ही ईश्वर की भक्ति की जा सकती है।