नई दिल्लीः कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला है। जिसके चलते बीजेपी को कर्नाटक में अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। बीजेपी की हार के कारणों को लेकर तमाम तरह की अटकले लग रही हैं। लेकिन चुनाव विशेषज्ञ और रणनीतिकार बीजेपी की हार को स्थानीय लिंगायत नेता बीएस येदियुरप्पा को जुलाई 2021 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटा दिए जाने का नतीजा बता रहे हैं। जिसे लिंगायत समुदाय के गुस्से के परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है। फिलहाल पार्टी नेतृत्व इस बात पर मंथन कर रहा है कि येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाने से उपजी नाराजगी से इस चुनाव में पार्टी को कितना नुकसान हुआ है? साथ ही आने वाले लोकसभा चुनाव में कैसे लिंगायत समुदाय के साथ फिर से सामंजस्य कायम किया जा सके? ताकि आगे इस तरह के नुकसान से बचा जा सके।

कर्नाटक की राजनीति की अगर बात करें तो यहां लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय का दबदबा माना जाता है। खासतौर पर लिंगायत समुदाय जिसकी आबादी राज्य में लगभग 17 प्रतिशत तक है। कहा जाता है कि लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के लोग जिस भी पार्टी से जुड़ जाते हैं उसका पासा पलटना तय है। यही कारण है कि लिंगायत समुदाय के गुस्से के चलते बीजेपी को सत्ता से बाहर होना पड़ा। बता दें कि लिंगायत समुदाय ने बीजेपी से नाराजी के चलते विगत तीन दशकों में पहली बार कांग्रेस को वोट दिया और उसे राज्य की सत्ता तक पहुंचा दिया। अगर बात करें वोट शेयर की तो जिस क्षेत्र में लिंगायतों की बड़ी संख्या में आबादी है। उसमें बीजेपी की जीती हुई 6 में से 5 सीटों पर बीजेपी के वोट शेयर में काफी नुकसान हुआ है। कित्तूर, कल्याण और मध्य कर्नाटक में लिंगायतों की बड़ी आबादी है। पहले यहां कांग्रेस की अपेक्षा बीजेपी के पक्ष में जबरदस्त माहौल देखने को मिलता रहा है और यह माहौल सीटों में भी तब्दील हुआ है। लेकिन इस बार इन तीनों क्षेत्रों में बीजेपी को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। यहां कित्तूर में बीजेपी 26 में से 16, कल्याण में 15 से 10 और मध्य में 21 से 6 सीटों पर सिमट गई। जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या में इजाफा हुआ है।
वहीं पुराने मैसूरु क्षेत्र में भी कांग्रेस ने बीजेपी को जोरदार टक्कर देते हुए बीजेपी का बड़ा नुकसान पहुंचाया है। यहां कांग्रेस ने 43 सीटें जीती हैं। यहां इससे पहले कांग्रेस की 20 सीटें थी। वहीं बीजेपी 15 से गिरकर पांच सीटों पर आ गई। इसी तरह से तटीय क्षेत्र में बीजेपी को काफी नुकसान हुआ है। चुनाव से पहले कांग्रेस नेता सिद्धारमैया और वोक्कालिगा समाज के बड़े नेता शिवकुमार ने चुपचाप खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार के रूप में पेश किया और एकसाथ मिलकर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों में ऊर्जा का संचार किया। वहीं बीजेपी ने केंद्र और राज्य सरकार के कार्यों को गिनाया और डबल इंजन के फायदे बताए साथ ही विकास में तेजी लाने का दावा भी किया। जबरदस्त हार के बाद बीजेपी लीडर यह कहकर खुद को तसल्ली देने की कोशिश जरूर कर रहे हैं कि उनका वोट प्रतिशत पहले के ही बराबर है। जो 36 प्रतिशत पर बना हुआ है। बहरहाल कार्नाटक में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने लिए लिंगायत समुदाय का अहम रोल रहा है।