वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में व्यापक प्रशिक्षण अभियान प्रारंभ किया गया है। इस अभियान के तहत विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक अधिकारियों, वन विभाग के अधिकारियों तथा वन अधिकार समितियों के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रथम चरण में 21 जिला मुख्यालयों पर उपखंड स्तरीय वन अधिकार समितियों के शासकीय एवं अशासकीय सदस्यों सहित जिला स्तर पर नामांकित मास्टर ट्रेनर्स के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
प्रदेश में सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकारों के लिए 26 हजार से अधिक ग्रामों को चिन्हित किया गया है। इन अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पिछले वर्ष से विशेष अभियान संचालित किया जा रहा है। यह पहल मुख्यमंत्री Dr. Mohan Yadav के मार्गदर्शन में संचालित की जा रही है। उपखंड स्तरीय समितियों को वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ विशेष रूप से सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के संबंध में विस्तृत प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि दावों की प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी की जा सके।
जनजातीय कार्य विभाग ने विशेष पहल करते हुए टास्क फोर्स के विशेषज्ञों की सहायता से 35 राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनर्स की टीम तैयार की है। यह टीम अनुसूचित क्षेत्र के 20 जिलों की उपखंड स्तरीय समितियों के 828 सदस्यों को प्रशिक्षण प्रदान करेगी। इसके अतिरिक्त जिला स्तरीय मास्टर ट्रेनर्स का भी प्रशिक्षण जारी है, जो आगे ग्राम स्तर की वन अधिकार समितियों को प्रशिक्षित करेंगे। यह संपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्थान अभियान’ के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है।
जनजातीय कार्य विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), अनुविभागीय अधिकारी (वन), जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी तथा समिति में नामांकित जनपद पंचायत सदस्यों को शामिल किया गया है। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक वन संसाधन दावों की तैयारी, उनका परीक्षण, निराकरण और विधिसम्मत मान्यता प्रदान करने की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाना है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत वन निवासियों को दिए गए अधिकारों में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों का विशेष महत्व है। यह अधिनियम ग्राम सभाओं को अपने पारंपरिक जंगलों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का अधिकार प्रदान करता है। इसके माध्यम से अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को वन प्रबंधन में प्रमुख भूमिका मिलती है, जिससे स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
प्रदेश सरकार का यह अभियान न केवल अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने और ग्राम स्वराज की अवधारणा को मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा प्रयास है।